Bihar Politics: पोस्टर से लेकर पूजा तक-क्या सीएम बनने की तैयारी में हैं सम्राट चौधरी?बिहार की कुर्सी पर मौन का खेल, उपमुख्यमंत्री की खामोशी का क्या है राज, पढ़िए

Bihar Politics: दिल्ली में 10 अप्रैल को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के दौरान उनके साथ डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी भी मौजूद थे। लेकिन पटना लौटने के बाद सम्राट चौधरी का व्यवहार अचानक बदला हुआ नजर आया।...

सीएम बनने की तैयारी में हैं सम्राट चौधरी?- फोटो : social Media

Bihar Politics:बिहार की सियासत इन दिनों खामोशी के पर्दे में लिपटी एक बड़ी हलचल का इशारा दे रही है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दिल्ली दौरे, राज्यसभा की शपथ और उसके बाद अचानक तेज हुई सियासी गतिविधियों ने सत्ता परिवर्तन की आहट को और मजबूत कर दिया है। 14 अप्रैल को इस्तीफे की चर्चा ने पूरे सियासी माहौल को गर्म कर दिया है।

दिल्ली में 10 अप्रैल को राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के दौरान उनके साथ डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी भी मौजूद थे। लेकिन पटना लौटने के बाद सम्राट चौधरी का व्यवहार अचानक बदला हुआ नजर आया। आमतौर पर हर कार्यक्रम में सक्रिय रहने वाले सम्राट करीब 24 घंटे तक अपने घर में सिमटे रहे, यहां तक कि ज्योति बा फूले जयंती जैसे अहम आयोजन से भी दूरी बना ली।

सियासी गलियारों में यह खामोशी कई सवाल खड़े कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने अपने नेताओं को लो प्रोफाइल रहने का निर्देश दिया है, जब तक नई सरकार की तस्वीर साफ न हो जाए। यह भी चर्चा है कि सम्राट चौधरी को भावी मुख्यमंत्री के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन पार्टी के भीतर आम सहमति बनाने की कवायद जारी है।

इधर, नीतीश कुमार से सम्राट चौधरी की मुलाकात और उसके तुरंत बाद डिप्टी सीएम विजय सिन्हा का राजभवन पहुंचना सियासी घटनाक्रम को और रहस्यमय बना देता है। माना जा रहा है कि नई सरकार के गठन की पटकथा लगभग तैयार है। दिल्ली में भाजपा कोर कमेटी की बैठक का ऐन वक्त पर रद्द होना भी कई इशारे दे रहा है। बिहार प्रभारी विनोद तावड़े की सक्रियता और अलग-अलग नेताओं से मुलाकातें इस बात का संकेत हैं कि पार्टी अंदरखाने बड़ा फैसला लेने के मुहाने पर है।

वहीं, भाजपा कार्यालय के बाहर सम्राट चौधरी को सीएम बनाने की मांग वाला पोस्टर लगना और तुरंत हट जाना, इस सियासी स्क्रिप्ट में एक और ट्विस्ट जोड़ता है। सवाल यह उठता है कि क्या यह सब कुछ पहले से तय रणनीति का हिस्सा है? एक बात साफ है है नरेंद्र मोदी और अमित शाह के फैसले के आगे पार्टी में विरोध की कोई गुंजाइश नहीं होती। अब निगाहें 14 अप्रैल पर टिकी हैं, जहां बिहार की सियासत एक नया मोड़ ले सकती है।