'मरीजों को बाहर भेजना सरकार की लाचारी'; बिहार भवन निर्माण पर बक्सर सांसद के तीखे सवाल

सांसद सुधाकर सिंह ने मुंबई में ₹314 करोड़ की लागत से बनने वाले बिहार भवन का विरोध करते हुए सरकार से पूछा है कि यह पैसा राज्य में कैंसर अस्पताल बनाने पर खर्च क्यों नहीं किया जा रहा?

Patna - बक्सर सांसद सुधाकर सिंह ने मुंबई में बननेवाले 30 मंजीला बिहार भवन के निर्माण को लेकर बिहार सरकार पर निशाना साधा  है। उन्होंने पूछा है कि मुंबई में बिहार भवन निर्माण की जगह इन पैसे से   बिहार में कैंसर के लिए सुपर स्पेशलिटी अस्पताल का निर्माण  क्यों नहीं किया जा रहा है। सुधाकर सिंह ने कहा  है कि अगर बिहार में अस्पताल का निर्माण कराया जाएगा तो यहां के लोगों को इलाज के लिए इतनी दूर जाने की आवश्यकता नहीं होगी। 

सुधाकर सिंह ने फेसबुक पर इसको लेकर फेसबुक पर अपने पोस्ट में सरकार की मंशा पर सवाल उठाया है।  उन्होंने लिखा है कि -...

मुंबई में ₹314 करोड़ की लागत से बिहार भवन निर्माण का फैसला बेहद चौंकाने वाला है। सवाल सीधा और स्पष्ट है— जब बिहार में कैंसर से लोग मर रहे हैं, तब सरकार भवन बनाने में करोड़ों रुपये क्यों खर्च कर रही है?

बिहार की सबसे बड़ी स्वास्थ्य त्रासदी यह है कि आज भी राज्य में कैंसर के इलाज के लिए कोई समर्पित सुपर स्पेशलिटी अस्पताल उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि बिहार के हजारों कैंसर मरीज इलाज के लिए मजबूरन मुंबई, दिल्ली या चेन्नई जाते हैं। यह उनकी पसंद नहीं, बल्कि मजबूरी है। जब अपने ही राज्य में इलाज की व्यवस्था नहीं होगी, तो आम आदमी आखिर जाएँ भी तो कहाँ जाएँ?

₹314 करोड़ की राशि कोई मामूली रकम नहीं है। इसी राशि से बिहार में एक आधुनिक कैंसर सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की नींव रखी जा सकती है। ऐसा अस्पताल जहाँ बिहार के मरीजों को इलाज के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर न जाना पड़े, न ट्रेन में धक्के खाने पड़ें, न ही इलाज के अभाव में जान गंवानी पड़े।

सरकार का तर्क है कि मुंबई का बिहार भवन इलाज के लिए आने वाले मरीजों की सुविधा के लिए बनाया जा रहा है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह सुविधा आम मरीजों के लिए नहीं, बल्कि अधिकारियों, नेताओं और विशेष वर्ग के लिए होगी। एक गरीब कैंसर मरीज पहले ही दवा, जांच और ऑपरेशन के खर्च से टूट चुका होता है। उसके लिए मुंबई में इलाज कराना असंभव होता है। ऐसे में भवन बनाकर सरकार किस मरीज की मदद कर रही है?

यह फैसला दरअसल सरकार की सोच को उजागर करता है। सरकार यह मान चुकी है कि बिहार में बेहतर इलाज उपलब्ध कराना उसकी प्राथमिकता नहीं है, इसलिए वह मरीजों को बाहर भेजने की व्यवस्था कर रही है। यह नीति न केवल अमानवीय है, बल्कि बिहार के स्वास्थ्य तंत्र की असफलता की खुली स्वीकारोक्ति भी है।

अगर सरकार सच में मरीजों के हित में सोचती, तो ₹314 करोड़ मुंबई में भवन बनाने के बजाय बिहार में कैंसर अस्पताल, सुपर स्पेशलिटी मेडिकल कॉलेज और आधुनिक जिला अस्पतालों पर खर्च किए जाते। इससे न केवल हजारों जिंदगियाँ बचतीं, बल्कि बिहार के स्वास्थ्य ढांचे में स्थायी सुधार होता।

आज जरूरत इस बात की है कि सरकार यह समझे कि बिहार को मुंबई में भवन नहीं चाहिए, बिहार को अपने यहाँ इलाज चाहिए।

बिहार को कंक्रीट की इमारतें नहीं, कैंसर अस्पताल चाहिए।