धर्मांतरण पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, धर्म बदला... तो हक भी खत्म, नहीं मिलेगा अनुसूचित जाति का लाभ

धर्म बदलकर अनुसूचित जाति समुदाय का लाभ लेने वालों को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा झटका दिया है

Supreme Courts on religious conversion- फोटो : news4nation

Supreme Courts on religious conversion : सर्वोच्च न्यायालय ने ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा पाने और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति पी.के. मिश्रा और एन.वी. अंजारिया की पीठ ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि ईसाई धर्म अपनाने और उसका सक्रिय रूप से पालन करने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।


यह मामला पादरी चिंथदा आनंद की ओर से दायर अपील से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने मई 2025 के हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। आनंद ने आरोप लगाया था कि कुछ लोगों ने उनके साथ जाति आधारित भेदभाव और दुर्व्यवहार किया, जिसके बाद उन्होंने एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था। हालांकि, आरोपियों ने तर्क दिया कि आनंद ईसाई धर्म अपना चुके हैं और पादरी के रूप में कार्यरत हैं, इसलिए वे अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित कानूनी संरक्षण के पात्र नहीं हैं। जांच पूरी होने के बाद जब मामला अदालत पहुंचा, तो हाईकोर्ट ने एफआईआर को रद्द कर दिया था।


हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जाति का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है और केवल SC प्रमाण पत्र होना पर्याप्त नहीं है। इसके खिलाफ आनंद ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन शीर्ष अदालत ने भी हाईकोर्ट के निर्णय को सही ठहराया।


सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने न तो अपने मूल धर्म में वापसी का दावा किया और न ही अपने समुदाय में दोबारा स्वीकार किए जाने का कोई प्रमाण दिया। ऐसे में यह स्पष्ट है कि वह लंबे समय से ईसाई धर्म का पालन कर रहे हैं और पादरी के रूप में सक्रिय हैं। इस फैसले को धर्मांतरण और आरक्षण से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है।