Vasant: फागुन का रंग, वसंत का राग, जब प्रकृति गाती है, धरती सतरंगी हो जाती है, पढ़िए वाङ्मय की सुगंध और सृजन का उत्सव के रंग के बारे में

Vasant: सृष्टि के प्राकट्य काल से ही प्रकृति और मानव का संबंध अटूट एवं अविच्छिन्न रहा है। मानव चेतना का पल्लवन प्रकृति की गोद में ही संपन्न हुआ।....

फागुन का रंग, वसंत का राग- फोटो : Hiresh Kumar

Vasant: सृष्टि के प्राकट्य काल से ही प्रकृति और मानव का संबंध अटूट एवं अविच्छिन्न रहा है। मानव चेतना का पल्लवन प्रकृति की गोद में ही संपन्न हुआ। आदिम युगीन मानव ने जब अपनी क्षुधा और सुरक्षा हेतु प्रकृति पर निर्भरता का अनुभव किया, तभी से उसके भीतर कल्पना की ऊर्मी और वैचारिक प्रकटीकरण की प्रक्रिया का सूत्रपात हुआ। प्रकृति के परिवर्तनशील, बहुवर्णी और चित्ताकर्षक स्वरूप को देखकर ही मानव हृदय में भावाभिव्यक्ति की उद्भावनाएँ जाग्रत हुईं। आर्यावर्त की पावन धरा, जो कश्मीर के तुषाराच्छादित शिखरों से कन्याकुमारी के उत्ताल तरंगों तक और गुजरात के मरू-प्रदेश से असम के शस्य-श्यामल अंचलों तक विस्तृत है, अपनी भौगोलिक विविधता के मध्य भी एक सांस्कृतिक एकता को संजोए हुए है।

भारतीय कालगणना के अनुसार, वर्ष भर में षड्ऋतुओं वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर का चक्र अनवरत चलता रहता है। इनमें 'वसंत' का आगमन शिशिर की रिक्तता के पश्चात एक नव-जीवन के शंखनाद के समान है। यह केवल एक ऋतु नहीं, अपितु धरा का श्रृंगार है, जो चराचर जगत को नव-उत्साह से आप्लावित कर उसे मनोहारिणी छटा से अलंकृत कर देता है।

चैत्र और वैशाख मास की संक्रांति के साथ ही 'ऋतुराज' का आधिपत्य स्थापित होता है। इसे 'मधुमास' की संज्ञा भी दी गई है क्योंकि इस काल में प्रकृति माधुर्य से परिपूर्ण हो जाती है। कुहासे का तिरोधान होता है और नभमंडल निर्मल, स्वच्छ एवं नीलिमा से युक्त हो जाता है। जलाशयों का जल अपनी भौतिक मलीनता त्यागकर पारदर्शी और आकर्षक हो जाता है। वनराजि में नवीन कोपलें प्रस्फुटित होती हैं और महुए की मादक गंध संपूर्ण वातावरण को सुरभित कर देती है।

कृषि प्रधान संस्कृति में वसंत का महत्व और भी प्रगाढ़ है। सरसों के स्वर्णमयी पुष्प, गेहूँ की बालियाँ और चने-मटर के प्रफुल्लित पौधे कृषक के अंतर्मन को उल्लास से भर देते हैं। इसी कालखंड में विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती का पूजन, रंगों का महापर्व होली और रामनवमी जैसे उत्सव जनमानस में आध्यात्मिक एवं सामाजिक समरसता का संचार करते हैं। अमराइयों में कोकिल का पंचम स्वर और पुष्पों पर मँडराते भ्रमरों का गुंजन इस ऋतु के सौंदर्य को चरम सीमा तक पहुँचा देता है।

संस्कृत वाङ्मय के अद्वितीय कवि कुलगुरु कालिदास ने 'ऋतुसंहार' और 'कुमारसंभव' में वसंत का जो सजीव और मादक चित्रण किया है, वह कालजयी है। कालिदास के काव्य में वसंत केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, अपितु कामदेव का मूर्त स्वरूप है। उन्होंने आम्र-मंजरियों को कामदेव के पंच-शायक (पाँच बाणों) में सर्वाधिक तीक्ष्ण बाण माना है।

"आम्रपुष्पेषु मलयज-समीरः संचरन् मकरन्द-बिन्दून् विकिरति।"

जब मलय पर्वत से प्रवाहित होने वाली शीतल-मंद-सुगंधित समीर आम के बौरों को झकझोरती है, तो संपूर्ण परिवेश कामोत्तेजक और मोहक हो जाता है। कालिदास की दृष्टि में कोकिल की कूक केवल मधुर ध्वनि नहीं, अपितु वियोगी हृदयों को मर्माहत करने वाली प्रेम की पुकार है। उनके काव्य में प्रकृति चेतनावस्था में है, जहाँ वृक्ष पुष्पों के माध्यम से हँसते हैं और लताएँ पवन के झोंकों से नृत्य करती प्रतीत होती हैं।

मैथिली कोकिल विद्यापति ने वसंत को एक 'नवल' चेतना के रूप में देखा है। उनके पदों में राधा और कृष्ण की रासलीला वसंत के सुरम्य वातावरण में और भी दीप्त हो उठती है। "नव-नव विकसित फूल" और "मातल अलिकूल" जैसे प्रयोग वसंत की नवीनता और उन्माद को रेखांकित करते हैं।

रीतिकालीन कवियों ने वसंत को 'कामदेव के नवजात शिशु' के रूप में चित्रित कर प्रकृति का मानवीकरण किया। सेनापति ने अपने कवित्तों में वसंत के राजसी ठाठ-बाट का वर्णन करते हुए इसे एक दिग्विजयी राजा के रूप में प्रस्तुत किया है। जब वे कहते हैं— "आवत वसंत रितुराज कहियतु है", तो ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं चतुरंगिणी सेना लेकर अपने सम्राट का स्वागत कर रही है। पुष्पों की सुगंध, भ्रमरों का गुंजन और कोकिल का गान—ये सभी इस राजसी ठाठ के अंग हैं।

तुलसीदास के रामचरितमानस और अन्य कृतियों में भी वसंत का वर्णन मर्यादा और भक्ति के आवरण में हुआ है। उन्होंने प्राकृतिक सुषमा को ईश्वर की विभूति मानकर उसकी वंदना की है। पुष्प, भ्रमर और कोकिल उनके यहाँ अध्यात्म और सौंदर्य के सहचर बनकर उपस्थित होते हैं। रीतिकाल में वसंत का स्वरूप और अधिक श्रृंगारिक हो उठा। सेनापति जैसे कवियों ने वसंत को रंग, गंध, नाद और उल्लास का उत्सव बना दिया—बरन-बरन तरु फूले उपवन वन, सोई चतुरंग संगदल लहियतु है। बंदी जिम बोलत विरद वीर कोकिल हैं, गुंजत मधुप गान-गुन महियतु है॥

आवे-आस-पास पहुपन की सुवास सोई,सोने के सुगंध माझ सेन रहियतु है। सोभा को समाज सेनापति सुख साज आजु,  आवत वसंत रितुराज कहियतु है।

आधुनिक काल तक आते-आते वसंत का स्वरूप केवल श्रृंगारिक नहीं रहा, बल्कि वह 'क्रांति' और 'नवजागरण' का प्रतीक बन गया। छायावाद के प्रणेता जयशंकर प्रसाद ने वसंत को "जीवन में पुलकित प्रणय" के समान माना है। उनकी पंक्तियाँ— "हे वसंत! तू क्यों आता है?"—जीवन की नश्वरता और सौंदर्य के क्षणिक सुख के प्रति एक दार्शनिक प्रश्न भी खड़ा करती हैं।

तू आता है, फिर जाता है/जीवन में पुलकित प्रणय सदृश/यौवन की पहली कांति अकृश/जैसी हो, वह तू पाता है, हे वसंत! तू क्यों आता है?

युवती धरा यह था वसंत-काल, हरे भरे स्तनों पर पड़ी कलियों की माल, सौरभ से दिक्कुमारियों का मन सींच कर, बहता है पवन प्रसन्न तन खींच कर।पृथ्वी स्वर्ग से ज्यों कर रही होड़ निष्काम...

जयशंकर प्रसाद के यहाँ वसंत यौवन की प्रथम कांति और प्रणय की पुलकित अनुभूति है। निराला ने वसंत को नवजीवन और क्रांति का अग्रदूत माना। महाप्राण निराला ने वसंत को एक नई ऊर्जा और यौवन के संदेशवाहक के रूप में प्रतिष्ठित किया। अपनी सुप्रसिद्ध कविता 'ध्वनि' में वे कहते हैं: "अभी-अभी ही तो आया है, मेरे वन में मृदुल वसंत।"

यहाँ वसंत निराला के अंतर्मन की वह जिजीविषा है, जो निराशा के अंधकार में भी नवजीवन का संचार करती है। निराला के लिए वसंत केवल ऋतु परिवर्तन नहीं, अपितु जड़ता के विरुद्ध चेतना का विद्रोह है।

भारतीय वसंत केवल हिंदी तक सीमित नहीं रहा, अपितु उर्दू शायरी ने भी इसे 'बहार' और 'होली' के माध्यम से आत्मसात किया। नज़ीर अकबराबादी ने "होली की बहारें" लिखकर इस उत्सव को इंसानियत और प्रेम का पर्व बनाया। जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की....

सूफी संतों ने इसे "ईद-ए-गुलाबी" की संज्ञा दी, जहाँ रंगों का खेल आध्यात्मिक एकाकार का माध्यम बना। मीर और गालिब की शायरी में भी वसंत की मादकता और विरह की वेदना के सुंदर साक्ष्य मिलते हैं। यह इस देश की साझी संस्कृति का प्रमाण है कि वसंत के रंग में सूफी संत और भक्त कवि दोनों समान रूप से सराबोर रहे हैं।

"क़ातिल जो मेरा ओढ़े एक सुर्ख शाल आया। प्रेम की मार कहीं पड़े न मोहब्बत की मार होली में।

आज के भौतिकवादी युग में, जहाँ कंक्रीट के जंगलों ने हरित वनों का स्थान ले लिया है और प्रदूषण ने ऋतुओं के संतुलन को बिगाड़ दिया है, वसंत का आगमन अब भी हमारे संकुचित हृदयों में आशा की किरण जगाता है। यद्यपि पर्यावरण संकट के कारण प्रकृति की वह नैसर्गिक छटा धूमिल हुई है, किंतु साहित्य आज भी उस "ऋतुराज" को सहेजने का प्रयास कर रहा है।

वसंत हमें सिखाता है कि शिशिर की कठोरता और पतझड़ की रिक्तता के बाद पुनर्जन्म निश्चित है। यह ऋतु हमें जड़ता त्याग कर पल्लवित होने का संदेश देती है।