Bihar News:नीतीश सरकार से सवर्ण आयोग ने कर दी बड़ी सिफारिश, भूमिहीन सवर्ण परिवार को मिले 5 डिसमिल जमीन, सवर्ण सियासत का नया दांव!

उच्च जातियों के विकास के लिए गठित राज्य आयोग यानी सवर्ण आयोग ने जिलाधिकारियों को साफ हिदायत दी है कि आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के सभी पात्र गरीबों को शत-प्रतिशत प्रमाण पत्र जारी किया जाए।

नीतीश सरकार से सवर्ण आयोग की बड़ी सिफारिश- फोटो : Hiresh Kumar

Bihar News: बिहार की सियासत में एक नया मोड़ सामने आया है। उच्च जातियों के विकास के लिए गठित राज्य आयोग यानी सवर्ण आयोग ने जिलाधिकारियों को साफ़ हिदायत दी है कि आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग (EWS) के सभी पात्र गरीबों को शत-प्रतिशत प्रमाण पत्र जारी किया जाए। साथ ही प्रमंडलीय आयुक्तों को यह ताकीद की गई है कि प्रक्रिया में आ रही रुकावटों का फ़ौरन निराकरण किया जाए।

नेहरू मार्ग (बेली रोड) स्थित कार्यालय में आयोजित समीक्षा बैठक में आयोग के अध्यक्ष डॉ. महाचंद्र प्रसाद सिंह ने यह रुख़ स्पष्ट किया। बैठक में यह भी सामने आया कि EWS नियमावली में कुछ खामियां मौजूद हैं, जिन्हें दूर करने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग और राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग से मशविरा ज़रूरी है। आयोग ने सभी जिलों से अब तक जारी, अस्वीकृत और लंबित EWS प्रमाण पत्रों का ब्यौरा तलब किया है इशारा साफ़ है कि अब ढिलाई बर्दाश्त नहीं होगी।

सियासी गलियारों में सबसे ज़्यादा चर्चा उस सिफ़ारिश की हो रही है, जिसमें उच्च वर्ग के गरीब भूमिहीन परिवारों को घर बनाने के लिए पांच डिसमिल बासगीत ज़मीन देने की मांग की गई है। आयोग का तर्क है कि सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की आबादी 25.09 प्रतिशत है, जिनमें करीब 49.07 प्रतिशत परिवारों की मासिक आय 10 हजार रुपये के आसपास है। ऐसे में आवास, शिक्षा और रोजगार के मोर्चे पर सरकारी सहारा लाज़िमी है।

आयोग ने छात्रों के लिए नि:शुल्क कोचिंग और छात्रावास की व्यवस्था, तथा प्रतियोगी परीक्षाओं में उम्र सीमा बढ़ाकर लड़कों के लिए 40 वर्ष और लड़कियों के लिए 45 वर्ष करने का प्रस्ताव भी सरकार के सामने रखा है।

आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण EWS केंद्र सरकार द्वारा लागू किए जाने के बाद से प्रमाण पत्र जारी करने में कठिनाइयों की शिकायतें मिल रही थीं। अब आयोग ने प्रशासनिक अमले को सख़्त संदेश दे दिया है कि हक़दारों को उनका हक़ हर हाल में मिले।

राजनीतिक नज़रिए से देखें तो यह पहल सामाजिक समीकरणों को साधने की एक नई कवायद भी मानी जा रही है जहां आर्थिक न्याय के नाम पर सियासत का तराज़ू फिर से संतुलित करने की कोशिश हो रही है। 

रिपोर्ट- हीरेश कुमार