Bihar Politics : जोरहाट विमान हादसे में बिहार के दो लाल वीरगति को प्राप्त, तेजस्वी यादव की चुप्पी पर हम ने उठाये गंभीर सवाल
Bihar Politics : असम में सैन्य विमान हादसे के 48 घंटे से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की ओर से शहीदों के लिए श्रद्धांजलि का एक शब्द तक सामने नहीं आया है।
PATNA : बिहार सरकार के मंत्री और हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ संतोष सुमन ने कहा की असम के जोरहाट में हुए दर्दनाक सैन्य विमान हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस दुखद हादसे में बिहार ने अपने दो वीर सपूतों — फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार और अग्निवीर दानिश आलम — को खो दिया। देश की संप्रभुता और सुरक्षा की वेदी पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले इन जांबाजों के साहस, समर्पण और सर्वोच्च बलिदान को पूरा देश अश्रुपूर्ण आंखों से नमन कर रहा है। दोनों जवानों ने बेहद कम उम्र में तिरंगे की शान के लिए अपनी जान दे दी, जिससे पूरे राज्य में शोक की लहर है।
उन्होंने कहा की इस राष्ट्रीय शोक के बीच बिहार के सियासी गलियारों से एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है जो बेहद चौंकाने वाली और विचलित करने वाली है। घटना के 48 घंटे से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की ओर से इन शहीदों के लिए श्रद्धांजलि का एक शब्द तक सामने नहीं आया है। सोशल मीडिया पर हर छोटे-बड़े राजनीतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत मुद्दों पर चौबीसों घंटे सक्रिय रहने वाले तेजस्वी बाबू की यह रहस्यमयी चुप्पी लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
कहा की जनता के बीच इस बात को लेकर विशेष रूप से आक्रोश और आश्चर्य है कि शहीद अग्निवीर दानिश आलम एक अल्पसंख्यक परिवार से आते थे, और अमूमन अल्पसंख्यक समाज के मुद्दों पर मुखर रहने वाले नेता भी इस पर मौन हैं। राजनीतिक विश्लेषकों और आम लोगों का कहना है कि यदि किसी राजनीतिक रूप से चर्चित व्यक्ति, बाहुबली या फिर किसी रसूखदार माफिया के साथ कोई अनहोनी होती, तो संवेदना और सहानुभूति व्यक्त करने में शायद चंद मिनटों की भी देरी नहीं लगती। ऐसे में देश के रक्षकों की शहादत पर यह उदासीनता समझ से परे है।
सुमन ने कहा की शहीदों का सम्मान और उनका सर्वोच्च बलिदान किसी दल, जाति, धर्म या वोट बैंक की राजनीति का विषय कभी नहीं हो सकता। देश के लिए जान देने वाला जवान सिर्फ एक सैनिक होता है, उसका कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं होता। लेकिन इस मामले में जिस तरह की अनदेखी देखने को मिली है, उसने बिहार की जनता को झकझोर कर रख दिया है। लोग सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक यह पूछ रहे हैं कि आखिर वोट बैंक के चश्मे से परे हटकर इन वीर सपूतों के सम्मान में दो शब्द क्यों नहीं कहे जा सके? बिहार की जनता आज विपक्ष और उसके शीर्ष नेताओं से सीधे तौर पर जवाब मांग रही है कि आखिर देश के असली नायकों के लिए संवेदना के दो शब्द भी इतने भारी क्यों पड़ गए, तेजस्वी बाबू? क्या हमारे जवानों की शहादत किसी राजनीतिक नफे-नुकसान के पैमाने पर मापी जाएगी? एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही तय होना जरूरी है, और देश के वीरों के सम्मान में दिखाई गई यह कथित बेरुखी बिहार के इतिहास में एक कड़वे सवाल के रूप में हमेशा दर्ज रहेगी।