Vasant: सजनी हो मन मोर मनावै बसंत न आवै...नवयौवन के मंगल-महापर्व की रसमयी आहट...बहकने लगे संत तो समझो वसंत है...

जब वायु में अनाम मादकता घुलने लगे,जब स्थिर साधु-संयमी संतों की दृष्टि भी क्षितिज की ओर चंचल हो उठे,तब जान लेना चाहिए कि वसंत का मधुर आगमन हो चुका है। ...

बहकने लगे संत तो समझो वसंत है... - फोटो : X

Vasant: भारतीय मानस में वसन्त केवल ऋतु-परिवर्तन का संकेत नहीं,अपितु नवयौवन की उच्छल मादकता, चेतना की पुनरुत्थान-शक्ति और जीवन के अविच्छिन्न उल्लास का प्रतीक है। जब हिमानी-निःश्वासों से जर्जरित धरा पर उष्मिल फुहार का स्पर्श होता है, तब प्रकृति के कण-कण में नवप्राण का संचार होता है। पतझार की शुष्कता के पश्चात् वह जैसे उन्मुक्त वेग से दौड़ता आता है निवारण के एक पाख, दो पाख भी सहन न करने वाला; और उसे जगाने के लिए किसी पछुवा बयार को अपनी समस्त प्राणशक्ति व्यय नहीं करनी पड़ती। वहाँ बसन्त केवल सांत्वना का शीतल निश्वास नहीं, अपितु स्थिर मादकता का परिपूर्ण आविर्भाव है। जब वायु में अनाम मादकता घुलने लगे,जब स्थिर साधु-संयमी संतों की दृष्टि भी क्षितिज की ओर चंचल हो उठे,तब जान लेना चाहिए कि वसंत का मधुर आगमन हो चुका है। यह वह ऋतु है, जो विरक्त हृदयों में भी नवस्फूर्ति का संचार करती है, और तपोवन के नीरव प्रांगण में भी राग का सूक्ष्म कंपन जगा देती है।

बहकने लगे संत तो समझो वसंत है, पीयरी पहन कर के बैठे साजन को देख के घुंघटा उठा दें गोरी तो समझो वसंत है....

जब पीतांबर धारण किए साजन आँगन में विराजमान हों और उन्हें निहार कर लजवंती गोरी संकोचवश अपना घूंघट अधखुला कर दे, तब वह क्षण केवल प्रणय का संकेत नहीं, अपितु ऋतु-संक्रमण का सजीव प्रतीक बन जाता है। पीयरी वसना धरा की हरितिमा से संवाद करती है और नयन की चितवन में नवयौवन की सुरभि व्याप्त हो जाती है।

वसंत की यही विशेषता है कि वह शुष्कता का निवारण कर हृदय-प्रदेश में कोमल अनुराग का प्रस्फुटन करता है। उसमें उन्मुक्त हास-परिहास भी है और मर्यादित लज्जा की शालीन आभा भी। जब संन्यस्त मन भी रागात्मक हो उठे और घूंघट की ओट से मुस्कान झलकने लगे तभी समझो, वसंत अपनी पूर्ण रसमयता के साथ अवतरित हो चुका है।

तो वहीं शिव का काम-दहन भारतीय कला के उत्कर्ष की चरम परिणति है काम का दहन, किंतु कामना का नहीं; देह का भस्मीकरण,किंतु चेतना का आलोकन। यह वही कला है जो कभी गंगावत् उच्छल, निर्झरिणी-सी प्रखर थी; आज वह विस्तीर्ण मैदानों में प्रवहमान होकर अपने उच्छ्वास की तीव्रता कुछ खो बैठी है। इसी के समक्ष पश्चिम की कला यमुनावत् गहन, श्यामल और वेदनापूरित रससंभार लेकर उपस्थित होती है। दोनों का संगम संश्लेष और संघात नवजीवन का हेतु बनता है; तथापि यदि गंगा की विशालता क्षीण हो और यमुना की रंगीनी अतिरेक से छा जाए, तो शरद् की निरभ्र शांति भी पतझार से आरोपित प्रतीत होने लगती है। फाग का गुलाल-राग मलार के ‘बहरे बहार’ में धुलने को उद्यत हो उठता है। जब तक आम न बौरे, तब तक तेरे लिए करील ही करील है। यही समन्वय भारतीय सौंदर्य-दृष्टि का प्राणतत्त्व है।

कालिदास की कला में वसन्त की उन्मादिनी सुरभि ग्रीष्म के मध्य भी मधुर गंध बिखेरती है। वहाँ पल्लव से मंजरी तक, मंजरी से मधुगंध तक, और मधुगंध से पिकी की आकुल पुकार तक सम्पूर्ण विकास का अनुक्रम विद्यमान है। बाण की वाणी में भी यह रसमयता स्पंदित है। पश्चिम का वसन्त गलित पर्णराशि में दबे बीजों के अंकुरण की प्रतीक्षा करता है; पूर्व का वसन्त हिमवात को अवसर ही नहीं देता, वह ओस-बिंदुओं पर सरसई आभा का आवाहन करता है।

सजनी हो मन मोर मनावै बसंत न आवै, फूलैं फूल फरें जनि तरुवर , राग फाग कोउ गावे, रहत उदास मोर दिल दिन भर छनहूँ नहीं धीर धरावे, बसंत न आवै...

बसन्त कभी आज्य था, कभी मधु; कभी काम का सहचर, कभी भारती का श्रृंगार; और कभी श्मशानवासी शिव के जीवन का मंगल-मुहूर्त। उसने होलिका-दहन में अन्याय के विरुद्ध अग्नि प्रज्वलित की, तो पिचकारी में अबीर-गुलाल भी घोला। टेसू, कचनार, अनार और सेमल में अंगार-सी दाहकता जगाई, तो बाग-बाग, तड़ाग-तड़ाग मधु की अजस्र धारा भी बहाई। यदि उसमें केसरिया लपट का बलिदानी आवेश है, तो जन-मन का गुलाबी उल्लास भी है।

भारतीय कला का प्रेय और श्रेय अविभक्त हैं, अतः उसका वसन्त केवल श्रेष्ठ नहीं, श्रेयस्कर भी है। वह अग्नि सुलगाता है, किंतु भस्म की रोरी भी लगाता है। वह समानता की पिचकारी लिए आता है बहुविधता के विनाशार्थ नहीं, अपितु उसे एक सलोने रंग में रंगने के लिए। मलयानिल की सहायता से वह धरती की सुरभि बिखेरता है और प्रत्युत्तर में उसका गरल स्वयं पी जाता है।

शिव ने काम को अनंग इसलिए किया कि वह विकलांग न हो, वरन् मन-मन, हृदय-हृदय, जड़-चेतन, चर-अचर में व्याप्त हो सके। यही वसन्त का परमार्थ है उद्गम से उत्कर्ष तक, दहन से दया तक, और रंग से रस तक का समन्वित महोत्सव।