Bihar News: बिहार में साथ सात हजार एकड़ जंगल का सफाया किसने किया,लोकसभा में खुलासे से मचा हड़कंप

Bihar News:बिहार में विकास की आड़ में सात हजार एकड़ जंगल की बली चढ़ा दी गई है।...

 forest in Bihar
बिहार में हजार एकड़ जंगल का सफाया - फोटो : social Media

Bihar News: कहा जाता है कि जो आप बोते हैं, वही आप काटते हैं। बिहार में  पेड़ों की बेतरतीब कटाई के कारण उत्पन्न हालात इस कहावत को सही साबित करते हैं। यहां सड़कों और नहरों के किनारे लगे पेड़ों की अत्यधिक कटाई की गई है। पेड़ों की निरंतर कटाई ने न केवल मानव जीवन को प्रभावित किया है, बल्कि असंतुलित मौसम के चक्र को भी जन्म दिया है। 

बिहार में विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर वन भूमि का सफाया किया जा रहा है। हाल ही में, यह जानकारी सामने आई है कि लगभग सात हजार एकड़ जंगल को विभिन्न विकास कार्यों के लिए काटा गया है। यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है, बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और आदिवासी समुदायों की जीवनशैली पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।बिहार में विकास के नाम पर कई परियोजनाएँ चल रही हैं, जिनमें सड़कें, औद्योगिक क्षेत्र और आवासीय कॉलोनियाँ शामिल हैं। इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक भूमि की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने बड़े पैमाने पर वनों की कटाई की है। उदाहरण के लिए, भारतमाला परियोजना जैसी सड़कों के निर्माण के लिए जंगलों को काटने का काम तेजी से किया जा रहा है। इस प्रकार की गतिविधियों से प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। इसका खुलासा लोकसभा में मंत्री के जवाब के बाद हुआ।काराकाट के भाकपा माले सांसद राजा राम सिंह ने वन भूमि के दूसरे कामों के लिए दिए जाने से संबंधित सवाल लोकसभा में पूछाे। इसका जवाब केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 24 मार्च को लोकसभा के पटल पर रखा। इसी रिपोर्ट में सामने आया है कि देश भर में 1,73,396.87 हेक्टेयर जंगल काटा गया।

बिहार में पिछले दो-तीन सालों में वन भूमि  का काफी ट्रांसफर हुआ है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार भारतमाता परियोजना के तहत वाराणसी-कोलकाता एक्सप्रेस के लिए गया से औरंगाबाद के बीच 103.22 हेक्टेयर जंगल की जमीन ट्रांसफर की गई है। इसी तरह एनएच-19 पर बक्सर को नई कनेक्टिविटी देने के लिए 5.66 हेक्टेयर जमीन दी गई है। इससे पेड़ों की कटाई बड़े पैमाने पर हुई । वन्य जीवों और पौधों की प्रजातियाँ जो इन जंगलों में निवास करती थीं, अब संकट में हैं।पेड़ों की अनुपस्थिति से मिट्टी का कटाव बढ़ता है, जिससे कृषि योग्य भूमि की गुणवत्ता प्रभावित होती है।कई आदिवासी समूह अपने जीवनयापन के लिए इन जंगलों पर निर्भर करते हैं। जब उनके संसाधनों को नष्ट किया जाता है, तो उनकी संस्कृति और पहचान भी खतरे में पड़ जाती हैं।वन आधारित आजीविका जैसे कि लकड़ी, फल और अन्य वन उत्पादों पर निर्भर लोगों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

बहरहाल बिहार में विकास की आड़ में हुए सात हजार एकड़ जंगल के सफाए ने न केवल पर्यावरण बल्कि समाज पर भी गंभीर प्रभाव डाला है। यह आवश्यक हो गया है कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले और सतत विकास की दिशा में कदम उठाए ताकि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जा सके और स्थानीय समुदायों के अधिकार सुरक्षित रह सकें।


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