छपरा के शैलेश कुमार ने रचा इतिहास: बैडवाटर-135 अल्ट्रा मैराथन जीतने वाले पहले भारतीय
अमेरिका की खतरनाक 'डेथ वैली' में आयोजित 217 किमी लंबी बैडवाटर-135 अल्ट्रा मैराथन को रिकॉर्ड 29 घंटे 28 मिनट में पूरा कर शैलेश कुमार सबसे तेज भारतीय बन गए हैं। किसान परिवार से निकलकर भारतीय नौसेना और फिर विश्व रिकॉर्ड तक का यह सफर हर भारतीय को गर्व
खेल के मैदान में कई बार ऐसी मिसालें देखने को मिलती हैं, जो यह साबित करती हैं कि अगर इरादे बुलंद हों तो हर कठिन रास्ता आसान हो जाता है। राष्ट्रीय खेल दिवस के अवसर पर बिहार के सारण जिले से एक ऐसी ही प्रेरणादायक खबर सामने आई है। छपरा के लाल शैलेश कुमार ने यह साबित कर दिया है कि सफलता पाने के लिए उम्र और विपरीत परिस्थितियां कभी रुकावट नहीं बनतीं। दुनिया की सबसे कठिन अल्ट्रा-मैराथन स्पर्धाओं में अपना परचम लहराकर उन्होंने पूरे देश को गौरवान्वित किया है।
साधारण पृष्ठभूमि और शुरुआती संघर्ष बिहार के सारण जिला मुख्यालय से महज पांच किलोमीटर दूर गड़खा प्रखंड के कमालपुर गांव में जन्में शैलेश कुमार एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता बिंदेश्वरी प्रसाद एक किसान हैं और शैलेश अपने चार भाइयों में सबसे छोटे हैं। बचपन गांव की गलियों, खेतों और ग्रामीण परिवेश के बीच बीता। संसाधनों की भारी कमी के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की।
भारतीय नौसेना और अनुशासित जीवन शैली
परिवार की आर्थिक स्थिति को संबल देने और बेहतर भविष्य की चाह में शैलेश साल 2013 में भारतीय नौसेना में भर्ती हुए। वर्तमान में वे केरल के कोच्चि स्थित नेवल एयरक्राफ्ट यार्ड में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। नौसेना की अनुशासित जीवनशैली ने उनके भीतर छुपे एक बेहतरीन एथलीट को बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाई। विभागीय अधिकारियों के लगातार प्रोत्साहन और सहयोग के कारण ही उन्हें एडवेंचर स्पोर्ट्स में आगे बढ़ने का मौका मिला।
फिटनेस से अल्ट्रा रनिंग की ओर पहला कदम
शैलेश कुमार ने साल 2014 में अपनी शारीरिक फिटनेस बनाए रखने के लिए दौड़ना शुरू किया था, लेकिन धीरे-धीरे यह शौक जुनून बन गया। दो हाफ मैराथन और एक फुल मैराथन पूरी करने के बाद उन्होंने अल्ट्रा रनिंग का रुख किया। वर्ष 2018 में गुजरात के धोलावीरा में आयोजित 'रन द रण 101 किमी' मैराथन में उन्होंने ओवरऑल तीसरा स्थान प्राप्त कर सभी को चौंका दिया। यह सफलता उनके शानदार मैराथन करियर की मजबूत नींव साबित हुई।
देश-विदेश की कठिन स्पर्धाओं में गाड़े सफलता के झंडे
गुजरात में पहली बड़ी सफलता के बाद शैलेश ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने ग्रीस की 246 किलोमीटर लंबी ऐतिहासिक 'स्पार्टाथलॉन' अल्ट्रा मैराथन को मात्र 33 घंटे 56 मिनट 22 सेकंड में पूरा किया। इसके अलावा उन्होंने 'फोर्ट अल्ट्रा 100 माइल्स', 'व्हाइट सैंड अल्ट्रा' और 'हेनर बंबू अल्ट्रा' जैसी प्रतियोगिताओं में जीत के साथ नए रिकॉर्ड बनाए। उन्होंने सोलंग स्काई अल्ट्रा, मलनाड अल्ट्रा, डेक्कन अल्ट्रा और ला अल्ट्रा (111 किमी) जैसी दुर्गम पर्वतीय दौड़ों में भी अपनी धाक जमाई।
बैडवाटर-135: एक असंभव सपने की कठिन तैयारी
अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित 'डेथ वैली' (मृत्यु घाटी) की झुलसा देने वाली भीषण गर्मी में आयोजित होने वाली 135 मील (217 किमी) लंबी दौड़ को दुनिया की सबसे कठिन पैदल दौड़ माना जाता है। इस स्पर्धा में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए शैलेश ने करीब छह महीने तक बेहद कठिन प्रशिक्षण लिया। इस दौरान उन्होंने 3000 किलोमीटर से अधिक की ट्रेनिंग पूरी की और चिलचिलाती धूप में घंटों अभ्यास कर मानसिक दृढ़ता हासिल की।
रिकॉर्ड समय के साथ रचा नया इतिहास
बैडवाटर-135 में असली चुनौती डेथ वैली के अत्यधिक तापमान और शरीर की घटती ऊर्जा के बीच मानसिक संतुलन बनाए रखने की थी। शैलेश कुमार ने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर 29 घंटे 28 मिनट 37 सेकंड के अविश्वसनीय समय में इस दौड़ को पूरा किया। इस शानदार प्रदर्शन के साथ उन्होंने नया कोर्स रिकॉर्ड बनाया और बैडवाटर-135 को सबसे तेज समय में पूरा करने वाले पहले भारतीय एथलीट बनकर इतिहास रच दिया।
युवाओं के लिए प्रेरणा और जीवन दर्शन
शैलेश कुमार के लिए रनिंग केवल पसीना बहाने या मेडल जीतने का जरिया नहीं है, बल्कि वे इसे ध्यान, आत्म-अनुशासन और जीवन जीने का एक मार्ग मानते हैं। छपरा के एक छोटे से गांव से निकलकर अंतरराष्ट्रीय अल्ट्रामैराथन के मंच तक पहुंचने की उनकी यह यात्रा देश के उन सभी युवाओं के लिए एक मजबूत संदेश है, जो सीमित संसाधनों के कारण बड़े सपने देखने से डरते हैं।
धर्मेंद्र रस्तोगी की रिपोर्ट