सीवान में एके 47,दिल्ली में पैलेट गन पर बढ़ा विवाद, लोकतांत्रिक विरोध पर कितना बल प्रयोग जायज?पढ़िए

छात्र आंदोलन के वक्त सबसे गंभीर सवाल पैलेट गन और एके 47 के इस्तेमाल को लेकर है। क्या छात्रों पर पैलेट गन से गोली दागना सही था?...

student protest pellet gun: किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलनकारियों के उग्र होने, हिंसा फैलने या जन-धन की क्षति का खतरा पैदा होने पर पुलिस-प्रशासन का हस्तक्षेप जरूरी हो सकता है। राज्य के पास कानून-व्यवस्था कायम रखने और हिंसा रोकने के लिए पर्याप्त अधिकार भी हैं। लेकिन असली सवाल अधिकार होने का नहीं, बल्कि उस अधिकार के इस्तेमाल की सीमा और औचित्य का है। खासकर तब, जब सामने हथियारबंद भीड़ नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे छात्र हों।जंतर-मंतर से शुरू हुए ‘संसद चलो’ मार्च को रोकने के लिए पुलिस ने जिस स्तर का बल प्रयोग किया, अब उसकी वैधता और आवश्यकता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। राष्ट्रविरोधी तत्वों, हिंसक भीड़ और शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शनकारियों से निपटने का एक जैसा तरीका लोकतांत्रिक शासन की पहचान नहीं हो सकता। कानून-व्यवस्था के नाम पर बल प्रयोग भी परिस्थितियों के अनुपात में होना चाहिए।

सबसे गंभीर सवाल पैलेट गन और एके 47 के इस्तेमाल को लेकर है। दिल्ली पुलिस ने शुरुआत में प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन चलाए जाने से इनकार किया था। लेकिन बाद में जनरल डायरी में रैपिड एक्शन फोर्स द्वारा एंटी-रायट गन से दो राउंड फायर किए जाने का उल्लेख सामने आया। इसके बाद विवाद और गहरा गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने 17 अगस्त को जो फैसला सुनाया है उसमें सरकार की मुश्कील बढ़ सकती है।

सीवान में आंदोलन के सामय छात्रों पर एके 47 न सिर्फ ताना गया वरन कथित तौर पर फायरिंग भी की गई। हालाकि किसी छात्र को गोली नहीं लगी. देश की सबसे बड़ी अदालत ने सभी दृश्य श्रव्य सबूतों को संरक्षित करने का सरकार को निर्देश दिया है।  17 अगस्त को सीवान के डीएम को हटा दिया गया फिलहारल  उनको प्रतिक्षा की सूची में रखा गया है।

विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर तीखे हमले किए हैं। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग तक करते रहे हैं। इसी बीच सूचना के अधिकार के तहत दिल्ली के दो अस्पतालों से प्राप्त जानकारी ने मामले को और गंभीर बना दिया। उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक, 20 जुलाई को छात्र प्रदर्शन के दौरान कम से कम दस लोग पैलेट गन से घायल हुए और उन्होंने अस्पतालों में इलाज कराया।यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी राजनीतिक बयान या अपुष्ट सोशल मीडिया दावे पर नहीं, बल्कि अस्पतालों से प्राप्त आधिकारिक सूचना पर आधारित बताया गया है। यदि छात्रों के चेहरों, आंखों और छाती पर पैलेट के निशान मिले हैं और किसी छात्र की आंख की रोशनी जाने की आशंका है, तो यह महज कानून-व्यवस्था की कार्रवाई का सवाल नहीं रह जाता। यह पुलिस कार्रवाई की आवश्यकता, अनुपातिकता और जवाबदेही का सवाल बन जाता है।

यदि पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठते हैं तो जांच सिर्फ बयानबाजी के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। इस्तेमाल किए गए गोला-बारूद का पूरा रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, पुलिसकर्मियों के बॉडी कैमरा रिकॉर्ड, वायरलेस बातचीत, घटनास्थल की वीडियो रिकॉर्डिंग और घायलों के मेडिकल दस्तावेज सुरक्षित रखे जाने चाहिए। इन साक्ष्यों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए ताकि सच किसी राजनीतिक दावे या प्रतिदावे के नीचे दब न जाए।सरकार का दायित्व है कि भीड़ नियंत्रण में पैलेट गन के इस्तेमाल से जुड़े नियमों को सार्वजनिक और स्पष्ट करे। किन परिस्थितियों में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है, किस अधिकारी की अनुमति जरूरी है और किस स्तर का खतरा होने पर इसे अंतिम विकल्प माना जाएगा इन सभी सवालों का स्पष्ट जवाब होना चाहिए।अगर जांच में अंधाधुंध या नियमों के खिलाफ इस्तेमाल साबित होता है तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। वर्दी कानून से ऊपर नहीं हो सकती।

भारत में शांतिपूर्ण विरोध और अपनी बात रखने का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी शर्तों में शामिल है। प्रदर्शनकारियों का भी दायित्व है कि आंदोलन हिंसा, तोड़फोड़ और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का जरिया न बने। लेकिन सरकार और पुलिस की जिम्मेदारी भी कम नहीं है।विडंबना यही है कि देश में अक्सर छात्र आंदोलनों और धरनों के दौरान पुलिस बल का इस्तेमाल शुरुआती विकल्प जैसा दिखाई देता है। लाठीचार्ज, हिरासत और अब पैलेट गन जैसे सवाल लोकतांत्रिक संस्थाओं के सामने खड़े होते रहे हैं।

लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है, जब सरकार अपने विरोधियों और आलोचकों के साथ भी संयम बरते। कानून-व्यवस्था कायम रखना जरूरी है, लेकिन कानून के राज का मतलब यह नहीं कि असहमति को बलपूर्वक खामोश कर दिया जाए। छात्र प्रदर्शनकारियों की गलती हो तो कानून अपना रास्ता अपनाए, लेकिन पुलिस कार्रवाई भी कानून, विवेक और अनुपातिकता की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए।