आर्थिक मंदी के बीच उम्मीद की नई किरण: 'गोट मैन' प्रो. संजीव कुमार के अनूठे मॉडल
वैश्विक और घरेलू स्तर पर मंडराते आर्थिक संकट के बीच जहां रोजगार और आजीविका के पारंपरिक साधन सिमट रहे हैं, वहीं ग्रामीण भारत से बदलाव की एक बेहद खूबसूरत और हौसला बढ़ाने वाली तस्वीर सामने आ रही है। इस विपरीत परिस्थिति में भी बिहार और उत्तर प्रदेश के
पटना: वैश्विक और घरेलू स्तर पर मंडराते आर्थिक संकट के बीच जहां रोजगार और आजीविका के पारंपरिक साधन सिमट रहे हैं, वहीं ग्रामीण भारत से बदलाव की एक बेहद खूबसूरत और हौसला बढ़ाने वाली तस्वीर सामने आ रही है। इस विपरीत परिस्थिति में भी बिहार और उत्तर प्रदेश के लाखों गरीब और सीमांत परिवारों के लिए 'द गोट ट्रस्ट' और सरकारी सहयोग की जुगलबंदी वरदान साबित हो रही है। इस पूरे मूक आंदोलन के पीछे भागलपुर के रहने वाले और 'द गोट ट्रस्ट' के संस्थापक प्रो. संजीव कुमार का दूरदर्शी विजन है। उन्होंने आर्थिक तंगी के इस दौर में भी अपनी अनूठी सोच और धरातलीय योजनाओं के जरिए सीमांचल सहित बिहार और यूपी के ग्रामीण इलाकों में आर्थिक संपन्नता की एक नई इबारत लिख दी है।
प्रो. संजीव कुमार ने विशेष रूप से बिहार के मधेपुरा और पूर्णिया जैसे सुदूर जिलों में एक ऐसा आत्मनिर्भर और अचूक 'बिजनेस प्लान' विकसित किया है, जिसने पारंपरिक पशुपालन की परिभाषा ही बदल दी है। इस मॉडल को इस तरह डिजाइन किया गया है कि छोटे और सीमांत पशुपालकों को बाजार के उतार-चढ़ाव या किसी भी प्रकार के आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े। उनके इस विजन का सबसे बड़ा स्तंभ बनी हैं ग्रामीण महिलाएं और 'पशु सखियां'। प्रो. संजीव कुमार के इस क्रांतिकारी आइडिया की बदौलत आज बिहार और यूपी की हजारों पशु सखियां और बकरी पालक महिलाएं न सिर्फ अपने पैरों पर खड़ी हैं, बल्कि हर महीने हजारों रुपये की शानदार आमदनी कर अपने परिवारों का संबल बन रही हैं।
ट्रेनिंग से बदली तकदीर, अब NH किनारे चल रहे हैं 'महिला ढाबे'
इस मुहिम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल कागजी दावों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका जमीन पर सीधा असर दिख रहा है। 'द गोट ट्रस्ट' के माध्यम से बकरी पालक महिलाओं को आधुनिक, वैज्ञानिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) देकर उनकी आर्थिक स्थिति को बेहद मजबूत किया जा रहा है। प्रशिक्षण के बाद महिलाओं के आत्मविश्वास में ऐसी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है कि वे अब रूढ़िवादी बेड़ियों को तोड़कर बड़े व्यावसायिक फैसले ले रही हैं। इसी का नतीजा है कि सैकड़ों आत्मनिर्भर हो चुकी महिलाओं ने अब नेशनल हाईवे (NH) के किनारे खुद का ढाबा शुरू करने का साहसिक निर्णय लिया है और वे सफलतापूर्वक इन्हें चला भी रही हैं, जो ग्रामीण उद्यमिता की एक मिसाल है।
प्रो. संजीव कुमार के इस मॉडल ने गांवों में 'पशु सखियों' का एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर दिया है, जो पशुओं के प्राथमिक उपचार, टीकाकरण और सही खान-पान की जिम्मेदारी संभालती हैं। इससे न केवल पशुओं की मृत्यु दर में भारी कमी आई है, बल्कि ग्रामीण स्तर पर ही रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं। महिलाओं द्वारा हाईवे पर ढाबा चलाने जैसी पहल ने यह साबित कर दिया है कि सही मार्गदर्शन और ट्रेनिंग मिले तो ग्रामीण आजीविका को सीधे मुख्यधारा के बाजार से जोड़ा जा सकता है।
सीमांचल की बदलती आर्थिक और सामाजिक तस्वीर
भौगोलिक और आर्थिक रूप से पिछड़े माने जाने वाले सीमांचल के इलाकों में इस पहल ने संजीवनी का काम किया है। मधेपुरा, पूर्णिया और आसपास के जिलों में जहां बाढ़ और पलायन एक बड़ी समस्या रहे हैं, वहां अब बकरी पालन एक सम्मानजनक और मुनाफे वाले 'स्मॉल बिजनेस' के रूप में स्थापित हो चुका है। प्रो. संजीव कुमार के प्रयासों से यह स्पष्ट हो गया है कि बिना किसी भारी-भरकम पूंजी के भी, सिर्फ सही प्रबंधन और सामूहिक सीख के बल पर गरीबी के चक्रव्यूह को तोड़ा जा सकता है। आज इन क्षेत्रों की महिलाएं आर्थिक रूप से इतनी सक्षम हो चुकी हैं कि बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर के बड़े फैसलों में उनकी आवाज को तवज्जो मिल रही है।
भविष्य के रोडमैप को देखें तो 'द गोट ट्रस्ट' इस सफल आजीविका मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक विस्तार देने की तैयारी में जुटा है। विभिन्न राज्य ग्रामीण आजीविका मिशनों और सरकारी विभागों के साथ मिलकर इस योजना को इस तरह आगे बढ़ाया जा रहा है ताकि आने वाले समय में कोई भी छोटा पशुपालक खुद को असहाय न समझे। भागलपुर की माटी से निकलकर लाखों महिलाओं की किस्मत बदलने वाले प्रो. संजीव कुमार का यह आत्मनिर्भरता प्लान आज के दौर में देश के सामने एक रोल मॉडल की तरह खड़ा है, जो यह सिखाता है कि मंदी के दौर में भी अगर इरादे मजबूत हों और सोच व्यावहारिक हो, तो तरक्की के रास्ते खुद-ब-खुद खुल जाते हैं।