परिसीमन पर दक्षिण भारत के राज्यों का भारी विरोध, आखिर क्या है कारण?

New Delhi : केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े तीन अहम बिल संसद में पेश किए हैं. इन्हीं बिलों में शामिल है- डिलिमिटेशन यानी परिसीमन बिल 2026, शामिल हैं. इस डिलिमिटेशन बिल का दक्षिण भारत के राज्य भारी विरोध कर रहे है। गौरतलब है कि इस बिल पास होने के बाद लोकसभा में सांसदों की संख्या 543 से बढ़कर लगभग 850 हो जाएगी. फिर इन्हीं सांसदों में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी.


परिसीमन का मुद्दा पिछले 50 साल से राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता रहा है. दक्षिण भारत के राज्यों का कहना है कि अगर सीटों का बंटवारा सिर्फ जनसंख्या के आधार पर हुआ तो उन्हें नुकसान होगा, क्योंकि वे जनसंख्या नियंत्रण पर सफल रहे हैं. उत्तर भारत के कई राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी है. इसी वजह से 1976 और 2001 में संविधान संशोधन कर सीटों में बदलाव को टाल दिया गया था. अभी यह रोक 2026 तक लागू है. अब सरकार इस व्यवस्था को बदलना चाहती है. परिसीमन के समय किसी खास जनगणना से जोड़ने की बाध्यता हटाना चाहती है, जो अभी संविधान में लिखी हुई है. उसे बदलना चाहती है.


आज गुरुवार, 16 अप्रैल को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने ‘परिसीमन बिल 2026’ की कॉपी जलाकर अपना विरोध जताया. द हिंदू कीरिपोर्टके मुताबिक, डीएमके अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ने इसे एक ‘साजिश और काला कानून’ बताया. उन्होंने लोगों से गुरुवार को हर घर और सार्वजनिक जगह पर काले झंडे फहराने की अपील की.वहीं तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने स्टालिन से अपील की कि वे दक्षिणी राज्यों को एकजुट कर केंद्र के प्रस्ताव के खिलाफ साझा मोर्चा बनाएं. कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी आरोप लगाया कि इस प्रस्ताव की टाइमिंग के पीछे बीजेपी की राजनीतिक मंशा है. उन्होंने कहा कि यह कोशिश उन दक्षिणी राज्यों के महत्व को कम करने की है, जहां बीजेपी को जीत नहीं मिलती है.


*दक्षिण के राज्य क्यों विरोध कर रहे है*


हिंदुस्तान टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 2011 की जनगणना के मुताबिक, डिलिमिटेशन से इन पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र को सबसे ज्यादा फायदा होगा. जबिक तमिनलाडु, केरल, आंध्र प्रदेश+तेलंगाना, ओडिशा और पश्चिम बंगाल.आंध्र प्रदेश और तेलंगाना साथ में लिया गया है क्योंकि 2011 में आंध्र प्रदेश का बंटवारा नहीं हुआ था.इन राज्यों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा.
 
 

द हिंदू की रिपोर्टके अनुसार अगर तीनों प्रस्ताव लागू हो जाते हैं तो हिंदी भाषी राज्यों (हिंदी हार्टलैंड) की लोकसभा सीटों की हिस्सेदारी 38.1% से बढ़कर 43.1% हो जाएगी. लेकिन साउथ के राज्यों की हिस्सेदारी घटकर 24.3% से 20.7% रह जाएगी. रिपोर्ट के मुताबिक, इस प्रस्ताव के लागू होने पर उत्तर प्रदेश की लोकसभा में हिस्सेदारी 14.73% से बढ़कर 16.24% हो जाएगी, जबकि केरल की हिस्सेदारी 3.68% से घटकर 2.7% रह जाएगी.


बिहार की सीटें 40 से बढ़कर 72 यानी 7.37% से बढ़कर 8.47% हो जाएंगी. महाराष्ट्र में सीटें 48 से बढ़कर 78 हो जाएंगी और तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 50 होंगी. लेकिन बावजूद इसके तमिलनाडु की कुल हिस्सेदारी घटकर 7.18% से 5.88% हो जाएगी. इसे ऐसे समझिए कि जो लोग यूपी, बिहार ,मध्यप्रदेश और राजस्थान में रहते हैं उनकी आवाज उठाने वाले संसद में बढ़ जाएंगे. लेकिन जो गैर-हिंदी भाषी राज्य है, वहां सीटें तो बढ़ेंगी, लेकिन संसद में प्रतिनिधित्व घट जाएगा.


हालांकि अभी यह साफ नहीं है डिलिमिटेशन के बाद किस राज्य में कितने सांसद होंगे? अनुमान पर बात की जा रही है.