BJP kundali: राहु-केतु गोचर 2026 और मेदिनी ज्योतिष! देश की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत, देखे BJP का कुंडली

BJP kundali: राहु-केतु गोचर 2026, मेदिनी ज्योतिष और भृगु सिद्धांत के अनुसार देश की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत। बीजेपी, UGC नियम, सुप्रीम कोर्ट और राज्यों की राजनीति पर ज्योतिषीय विश्लेषण।

BJP के कुंडली में दिखे बड़े बदलाव- फोटो : social media

BJP kundali: ज्योतिषशास्त्र में राहु और केतु को छाया ग्रह कहा जाता है। ये आकाश में दिखाई देने वाले भौतिक ग्रह नहीं होते, बल्कि पृथ्वी और चंद्रमा की कक्षा के गणितीय प्रतिच्छेदन बिंदु माने जाते हैं। उत्तर दिशा के प्रतिच्छेदन को राहु और दक्षिण दिशा के प्रतिच्छेदन को केतु कहा जाता है। वैदिक और मेदिनी ज्योतिष में इन दोनों ग्रहों का संबंध अचानक होने वाली घटनाओं, भ्रम, सत्ता संघर्ष और वैचारिक उथल-पुथल से जोड़ा जाता है।

मेदिनी ज्योतिष के अनुसार राहु जातिवादी राजनीति, अवसरवाद, विदेशी हस्तक्षेप, गुप्त षड्यंत्र, आतंकवादी गतिविधियों और राजनीतिक घोटालों का संकेतक माना जाता है। वहीं भृगु ज्योतिष कहता है कि जब गोचर का राहु जन्मकालीन गुरु या राहु-केतु पर प्रभाव डालता है, तब किसी भी देश या संगठन की नीतियों और राजनीतिक विचारधाराओं में बड़ा बदलाव देखने को मिलता है।

वर्तमान राहु-केतु गोचर और उसका राजनीतिक संकेत

वर्तमान समय में केतु सिंह राशि में और राहु कुंभ राशि में स्थित हैं। यह गोचर 26 नवंबर 2026 तक प्रभावी रहेगा। कुंभ राशि जन आंदोलन, सामाजिक सुधार और वैचारिक प्रयोगों की राशि मानी जाती है, जबकि सिंह सत्ता, नेतृत्व और सरकार का प्रतीक है। ऐसे में यह गोचर सत्ता और समाज के बीच तनाव की स्थिति को दर्शाता है।

बीजेपी की स्थापना कुंडली पर राहु-केतु का प्रभाव

भारतीय जनता पार्टी की स्थापना कुंडली 6 अप्रैल 1980 को सुबह 11 बजकर 45 मिनट पर दिल्ली की मानी जाती है। इस कुंडली के अनुसार वर्तमान गोचर का राहु कुंभ राशि में जाकर जन्मकालीन केतु और बुध को प्रभावित कर रहा है। वहीं गोचर का केतु सिंह राशि में जाकर मंगल, शनि, राहु और गुरु जैसे प्रभावशाली ग्रहों पर संचार कर रहा है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह योग संगठन के भीतर वैचारिक दबाव, नेतृत्व स्तर पर असहजता और राजनीतिक निर्णयों को लेकर अस्थिरता का संकेत देता है। यह समय ऐसा हो सकता है जब पार्टी को आंतरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर संतुलन साधना पड़े।

UGC नियम, जातिगत राजनीति और भारत की कुंडली

13 जनवरी 2026 को UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म, जन्म स्थान और लिंग के आधार पर भेदभाव समाप्त करने के लिए नई नियमावली लागू की। इसके बाद मध्य भारत सहित कई क्षेत्रों में शिक्षण समुदाय और अगड़ी जातियों में असंतोष देखा गया। भारत की कुंडली 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि, दिल्ली की मानी जाती है, जिसका लग्न वृषभ है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार 5 फरवरी 2026 से मंगल में राहु की विंशोत्तरी दशा प्रारंभ हो रही है। यह दशा अप्रत्याशित राजनीतिक फैसलों, विरोध आंदोलनों और सत्ता संतुलन में बदलाव की स्थिति बनाती है।

UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप के ज्योतिषीय संकेत

13 जनवरी 2026 की मध्य रात्रि के समय कन्या लग्न उदय हो रहा था। उस समय लग्न पर मीन राशि के शनि की अशुभ दृष्टि थी। चतुर्थ भाव में लग्नेश और दशमेश बुध की युति अष्टमेश मंगल से बन रही थी और बुध सूर्य से अस्त अवस्था में था। यह योग विवाद, कानूनी अड़चन और न्यायिक हस्तक्षेप का संकेत देता है। मेदिनी ज्योतिष के अनुसार इस योग में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियमों पर रोक लगने और बाद में संशोधित रूप में लागू होने की संभावना बनती है। विशेष रूप से 1 जून 2026 के बाद, जब गुरु कर्क राशि में गोचर करेगा, तब संशोधित नियमों के साथ समाधान निकलने के संकेत मिलते हैं।

अशुभ शकुन और राज्यों की राजनीति

मध्य प्रदेश में 25 जनवरी को उज्जैन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का घोड़े से संतुलन बिगड़ना ज्योतिषीय ग्रंथ भद्रबाहु संहिता के अनुसार अशुभ शकुन माना गया है। इसका अर्थ है कि अगले एक वर्ष तक शासन को निर्णय संबंधी दबाव और राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है। OBC 27 प्रतिशत आरक्षण से जुड़े मामलों में भी सरकार को झटका लगने की आशंका बनती है। उत्तर प्रदेश में 27 जनवरी को बुलंदशहर स्थित शनि धाम मंदिर के शिखर पर बिजली गिरने से त्रिशूल, कलश और नारियल के टूटने की घटना सामने आई। बृहत संहिता के अनुसार मंदिर शिखर का क्षतिग्रस्त होना उस क्षेत्र की सत्ता के लिए चेतावनी संकेत माना जाता है। इसी अवधि में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का योगी सरकार के खिलाफ धरने पर बैठना, सत्ता के लिए असहजता के संकेत को और मजबूत करता है।

राहु का प्रभाव और सामाजिक न्याय की संभावित नीति

मेदिनी ज्योतिष के अनुसार राहु के प्रभाव में सत्ता में बैठी सरकारें अक्सर ऐसे सामाजिक और नीतिगत फैसले लेती हैं, जो अचानक होते हैं और दूरगामी असर डालते हैं। ज्योतिषीय संकेत बताते हैं कि 2026 के अंत तक भारतीय जनता पार्टी कुछ राज्यों में निजी क्षेत्र और शिक्षण संस्थानों से जुड़ी सीमित सामाजिक न्याय या आरक्षण नीति पर विचार कर सकती है।