जब धुल जाए मन की मैल, जब बारिश बन जाए प्रकृति का संगीत, सावन में जग जाती है प्रेम, विरह और भक्ति की धुन, इस कारण हर बूंद में छिपा है शिवत्व का संदेश, पढ़िए

Sawan: सावन केवल बरसता नहीं वह भीतर उतरता है, मन को झकझोरता है और शिवत्व की ओर लौटने का मार्ग प्रशस्त करता है।

सावन के हर बूंद में छिपा है शिवत्व का संदेश- फोटो : Hiresh Kumar

Sawan: सावन मे प्रकृति अपना श्रृंगार करती है उसका स्वरूप मानो बदल जाता है। आकाश से गिरती वर्षा की प्रत्येक बूंद धरती पर दस्तक नहीं देती, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन में छिपे भावों की परतें उधेड़ती चली जाती है। सावन और वर्षा की यह जुगलबंदी कभी विरह की वेदना बनकर आंखों से बरसती है तो कभी मिलन की प्रसन्नता बनकर मन को उल्लास से भर देती है। इसीलिए सावन केवल एक मास नहीं, बल्कि संवेदना, श्रद्धा और स्मृति का ऐसा अध्याय है, जिसमें मनुष्य अपने भीतर के अपराध, अवसाद और अशांति को भी धो डालने का प्रयत्न करता है। सावन की झड़ी में गिरती बूंदों को यदि गौर से देखा जाए तो वे जलकण मात्र नहीं लगतीं। प्रत्येक बूंद में एक अदृश्य नृत्य छिपा होता है। वर्षा की रिमझिम मानो प्रकृति का संगीत है और उसकी लय पर वृक्ष, लताएं, खेत और मनुष्य का मन एक साथ थिरक उठते हैं। सावन कभी प्रेम का संदेशवाहक बनता है तो कभी विरह की पीड़ा का साक्षी। यही उसकी विशिष्टता है कि प्रत्येक व्यक्ति उसे अपने भावों और अनुभूतियों के अनुरूप ग्रहण करता है।

सनातन परंपरा में श्रावण मास का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। भगवान शिव को यह मास अतिप्रिय माना गया है। पूरे श्रावण में शिवोपासना, व्रत, उपवास, दान, पवित्र नदियों में स्नान और शिवलिंग का अभिषेक करने की परंपरा रही है। श्रावण सोमवार को विशेष धार्मिक महत्त्व प्राप्त है। श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान कर भगवान शिव की आराधना करते हैं और जल, दुग्ध, बेलपत्र तथा अन्य पूजन सामग्री अर्पित करते हैं। कुंवारी कन्याएं उत्तम वर की कामना से व्रत रखती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं पति के दीर्घायु और परिवार के मंगल की प्रार्थना करती हैं। इस प्रकार सावन व्यक्तिगत आस्था से लेकर पारिवारिक मंगलकामना तक का आध्यात्मिक सेतु बन जाता है।

श्रावण मास की महत्ता के पीछे माता पार्वती और भगवान शिव से जुड़ी पौराणिक कथा भी अत्यंत प्रसिद्ध है। मान्यता है कि माता सती के देहत्याग के पश्चात उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती ने कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनकी मनोकामना पूर्ण की। इसी पुनर्मिलन की स्मृति में श्रावण मास को शिवभक्ति का विशेष काल माना जाता है।

एक अन्य मान्यता समुद्र मंथन से जुड़ी है। समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष ने समस्त सृष्टि को संकट में डाल दिया था। तब भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की और नीलकंठ कहलाए। विष की उष्णता को शांत करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर जल अर्पित किया। यही कारण है कि शिवाभिषेक में जल का विशेष महत्त्व माना जाता है।

वर्षा ऋतु के साथ आरंभ होने वाला चातुर्मास भी भारतीय धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण काल है। मान्यता है कि इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और धार्मिक दृष्टि से भगवान शिव की उपासना का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। इसलिए श्रद्धालु व्रत, दान, जप, तप और पूजन के माध्यम से अपनी आस्था प्रकट करते हैं।

सावन वास्तव में प्रकृति और अध्यात्म के बीच स्थापित वह पवित्र संधि है, जिसमें वर्षा की प्रत्येक बूंद मानो मनुष्य के भीतर जमा विकारों के विरुद्ध एक मौन अभियान छेड़ देती है। यह ऋतु सिखाती है कि जैसे वर्षा धरती की धूल धो देती है, वैसे ही श्रद्धा मनुष्य के अंतर्मन पर जमी निराशा, अहंकार और अशांति की परतों को धो सकती है। सावन इसलिए केवल बरसता नहीं वह भीतर उतरता है, मन को झकझोरता है और शिवत्व की ओर लौटने का मार्ग प्रशस्त करता है।

हीरेश कुमार