UGC News Act 2026: UGC का नया नियम: समानता के नाम पर विभाजन? सरकार की ये कैसी नीति...
UGC News Act 2026: यह नियम SC/ST/OBC को पीड़ित और मुख्य रूप से सवर्ण को संभावित दोषी के रूप में देखते प्रतीत होते हैं। सामान्य वर्ग के भेदभाव (जैसे रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन) को संबोधित नहीं करता। यह कनून प्रोफेसरों में डर का माहौल पैदा कर रहा...
UGC News Act 2026: 2026 में UGC ने "Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations" अधिसूचित किया है। इसका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों (विश्वविद्यालयों, कॉलेजों) में जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करना और समानता को बढ़ावा देना है। नियमों के अनुसार, जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा मुख्य रूप से SC, ST और OBC समुदायों के सदस्यों के खिलाफ अनुचित व्यवहार (प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष) पर केंद्रित है। इसमें सामान्य (सवर्ण) वर्ग के सदस्यों को भेदभाव का शिकार मानने का प्रावधान स्पष्ट रूप से नहीं है—यह "विशेष रूप से" SC/ST/OBC के खिलाफ भेदभाव को लक्ष्य बनाता है।संस्थानों को अनिवार्य रूप से करना होगा:Equal Opportunity Centre (EOC) स्थापित करना। Equity Committee बनाना, जिसमें SC/ST/OBC, महिलाओं, दिव्यांगों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है।
24 घंटे चलने वाली Equity Helpline
शिकायत मिलते ही कमिटी 24 घंटे में बैठक करेगी, 15 दिनों में रिपोर्ट देगी, और संस्थान प्रमुख 7 दिनों में कार्रवाई करेगा। गैर-अनुपालन पर UGC संस्थान को ग्रांट्स, डिग्री प्रोग्राम्स, ODL/ऑनलाइन मोड से वंचित कर सकता है। यह नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और पिछले वर्षों में बढ़ती शिकायतों (2019-20 में 173 से 2023-24 में 378 तक, यानी 118% वृद्धि) के संदर्भ में आए हैं। रोहित वेमुला (2016) और पायल तड़वी (2019) जैसे मामलों ने इसे प्रेरित किया, जहां जातिगत भेदभाव को आत्महत्या का कारण माना गया।
रोलेक्ट एक्ट जैसा 'काला कानून'?
यह कनून विभाजनकारी है...इसकी प्रक्रिया में सर्वप्रथम संतुलन की भरी कमी दिख रही है...अब भला सोचिए...शिकायत पर तुरंत कार्रवाई (24 घंटे में बैठक) का प्रावधान किया गया है..लेकिन प्रारंभिक जांच (preliminary inquiry) का स्पष्ट प्रावधान नहीं। जो सवर्ण समाज की आशंका है को पुष्ट करता है कि इस कानून के तहत आरोप सिद्ध होने से पहले ही सजा (निलंबन, निष्कासन, पुलिस में केस) हो सकती है।
झूठे आरोपों पर सुरक्षा: अब इस खेल को समझिए..
इस कानून के अंतिम नियमों में झूठी शिकायत पर जुर्माने या अनुशासनिक कार्रवाई का प्रावधान ड्राफ्ट से हटा दिया गया। इससे इसके दुरुपयोग की आशंका बढ़ती है, जैसा SC/ST एक्ट के कई मामलों (सुप्रीम कोर्ट ने भी 2018 में फर्जी केसों पर टिप्पणी की थी) यह देखा भी गया..इससे पीड़ित होने वालों की लंबी फेहरिस्त है...
बता दें कि यह नियम SC/ST/OBC को पीड़ित और मुख्य रूप से सवर्ण को संभावित दोषी के रूप में देखते प्रतीत होते हैं। सामान्य वर्ग के भेदभाव (जैसे रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन) को संबोधित नहीं करता। यह कनून प्रोफेसरों में डर का माहौल पैदा कर रहा...अगर इसे लागू किया गया तो आने वाले दिनों में आलोचना या सख्ती को भी जातिगत भेदभाव कहकर उसका आराम से दुरुपयोग किया जा सकता है और उसका परिणाम यह होगा कि सीधे तौर पर अकादमिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी।
सरकार जवाब दे....
उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव है इससे इंकार नहीं किया जा सकता... IITs, JNU, AIIMS जैसे संस्थानों में SC/ST/OBC छात्रों की ड्रॉपआउट दर, आत्महत्या के मामले और अध्ययनों (जैसे IIT दिल्ली 2019) में 75% छात्रों द्वारा भेदभाव की रिपोर्ट इसे साबित करती है।नियम समानता के संवैधानिक आदेश (अनुच्छेद 14, 15, 17) को मजबूत करते हैं और संस्थानों को जवाबदेह बनाते हैं।
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SC/ST एक्ट का दुरूपयोग याद है न मोदी जी..समानता सबके लिए होना चाहिए...
इस कानून का भरपूर दुरुपयोग संभव है। बिना मजबूत सुरक्षा (झूठे आरोपों पर सजा, निष्पक्ष जांच) के यह SC/ST एक्ट जैसी समस्याओं को दोहरा सकता है—जहां अच्छे इरादे के बावजूद दुरुपयोग हुआ। सवर्ण समाज (लगभग 10-15% आबादी) को अल्पसंख्यक मानकर उनके अधिकारों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। समानता का मतलब सभी के लिए समान सुरक्षा है, न कि एक समूह को विशेषाधिकार देकर दूसरे को दोषी ठहराना।
झूठे आरोपों पर सख्त सजा, निष्पक्ष जांच, और सभी वर्गों (सवर्ण सहित) के भेदभाव को शामिल करने से यह वास्तविक समानता का कानून बनेगा। अन्यथा, यह रोलेक्ट एक्ट या SC/ST एक्ट की तरह विवादास्पद 'काला कानून' बन सकता है—जो समाज को जोड़ने के बजाय और बांट दे।