भाजपा का अभेद्य किला बन चुकी रक्सौल विधानसभा, कांग्रेस के गढ़ से कमल तक का सफर

Raxaul vidhan sabha assembly

पूर्वी चंपारण जिले की महत्वपूर्ण विधानसभा सीट रक्सौल (निर्वाचन क्षेत्र संख्या 10) बिहार की राजनीति में एक खास स्थान रखती है। कभी कांग्रेस का अटूट गढ़ रही यह सीट अब भाजपा के मजबूत किले में तब्दील हो चुकी है। साल 2000 से लेकर अब तक भाजपा ने यहां अपना वर्चस्व बनाए रखा है, हालांकि सीट पर उम्मीदवार जरूर बदले हैं।

1951 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राधा पांडे ने जीत दर्ज कर यहां पार्टी का झंडा फहराया। इसके बाद कई दशकों तक कांग्रेस का दबदबा रहा और 1985 तक पार्टी ने कुल 8 बार यहां से जीत दर्ज की।
1985 के बाद राजनीति ने करवट ली और 1990 व 1995 में जनता दल के राज नंदन राय ने जीत दर्ज की।

साल 2000 से भाजपा का उदय हुआ और अजय कुमार सिंह इस सीट पर लगातार तीन बार (2000, 2010, 2015) विजयी रहे। 2020 में भाजपा ने प्रत्याशी बदलते हुए प्रमोद कुमार सिन्हा को उतारा, जिन्होंने जीत के सिलसिले को आगे बढ़ाया।


हालिया चुनावी नतीजे:

  • 2020:

    • विजेता: प्रमोद कुमार सिन्हा (BJP) – 80,979 वोट (45.60%)

    • उपविजेता: राम शंभु यादव (INC) – 44,056 वोट (24.81%)

    • कुल मतदान: ~60%

  • 2015:

    • विजेता: अजय कुमार सिंह (BJP) – 64,731 वोट (39.81%)

    • उपविजेता: सुरेश कुमार (RJD) – 61,562 वोट (37.87%)

    • वोटिंग: 63.08%

  • 2010:

    • विजेता: अजय कुमार सिंह (BJP) – 48,686 वोट (42.91%)

    • उपविजेता: राज नंदन राय (LJP) – 38,569 वोट (33.99%)

    • वोटिंग: 54.00%

भाजपा को यहां यादव, भूमिहार, ब्राह्मण और शहरी वर्ग से समर्थन मिलता रहा है, जबकि विपक्ष मुस्लिम और यादव वोट बैंक को साधने की कोशिश करता है।


जातीय समीकरण:

  • यादव और मुस्लिम वोटर सबसे बड़ी भूमिका में, लगभग 35% से अधिक जनसंख्या।

  • भूमिहार, कोइरी, ब्राह्मण और राजपूत मतदाताओं की भी बड़ी भागीदारी है।

  • कुल मिलाकर यहां जातीय संतुलन बनाने में हर दल की रणनीति निर्णायक होती है।


जनसंख्या और मतदाता प्रोफाइल (2011 की जनगणना के अनुसार):

  • SC मतदाता – 28,525 (10.26%)

  • ST मतदाता – 2,030 (0.73%)

  • मुस्लिम मतदाता – 62,276 (22.4%)

  • ग्रामीण मतदाता – 2.42 लाख (87.25%)

  • शहरी मतदाता – 35,447 (12.75%)


स्थानीय मुद्दे: विकास की अधूरी तस्वीर

रक्सौल की जनता बार-बार बुनियादी सुविधाओं की मांग दोहराती रही है:

  1. रक्सौल को जिला बनाने की मांग (उत्तरी चंपारण के नाम से)

  2. ट्रैफिक जाम से मुक्ति के लिए पुल का निर्माण

  3. खेल मैदान, टाउन हॉल और रंगशाला का निर्माण

  4. ट्रामा सेंटर और तकनीकी महाविद्यालय की स्थापना

इन विकास कार्यों की घोषणाएं तो हुईं, लेकिन अधिकांश अधूरी हैं, जिससे मतदाताओं में नाराजगी भी देखी जाती है।

रक्सौल सीट पर भाजपा का मजबूत गढ़ बना रहना फिलहाल जारी है, लेकिन जातीय संतुलन, विकास के अधूरे वादे और विपक्ष की एकजुटता जैसे फैक्टर भविष्य के चुनाव को रोमांचक बना सकते हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव में यदि विपक्ष एकीकृत रणनीति के साथ मैदान में उतरता है, तो मुकाबला टक्कर का हो सकता है, वरना भाजपा को चुनौती देना कठिन होगा।