हरिद्वार में 'वेज बिरयानी बनाम वेज पुलाव' अभियान का मुस्लिम समाज ने किया समर्थन, 'राष्ट्रीय सूफी संत फाउंडेशन' ने कही यह बड़ी बात

उत्तराखंड की पावन नगरी 'वेज बिरयानी बनाम वेज पुलाव' को लेकर चल रहा अभियान कौमी एकता का मिशाल बन रहा है। श्री हिंदू तख्त और राष्ट्रीय सूफी संत फाउंडेशन के बैनर तले हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों ने मिलकर हर की पौड़ी और कनखल क्षेत्र की दुकानों से बिरयान

हरिद्वार में 'वेज बिरयानी बनाम वेज पुलाव' अभियान का मुस्लिम समाज ने किया समर्थन- फोटो : न्यूज4नेशन

Uttrakhand : उत्तराखंड की प्रसिद्ध धर्मनगरी हरिद्वार इन दिनों एक अनोखी सांस्कृतिक और भाषाई मुहिम को लेकर देश भर में चर्चा का केंद्र बनी हुई है। यहां 'वेज बिरयानी बनाम वेज पुलाव' को लेकर एक नया अभियान तेजी से गति पकड़ रहा है। 'अखंड परशुराम अखाड़ा' और स्थानीय संत समाज की ओर से शुरू किए गए इस अभियान के तहत, शहर की खाद्य संस्कृति और पहचान को लेकर एक नया वैचारिक बदलाव लाने की कोशिश की जा रही है।


दुकानों और रेहड़ी-पटरियों से हटाए गए 'बिरयानी' शब्द के पोस्टर

'श्री हिंदू तख्त' के प्रदेश अध्यक्ष यश देव कौशिक के नेतृत्व में संत समाज, ब्राह्मण समाज और मुस्लिम समुदाय के लोगों ने मिलकर हरिद्वार और कनखल क्षेत्र में एक विशेष अभियान चलाया। इस दौरान उन्होंने सड़कों, ठेलियों, दुकानों और रेहड़ी-पटरियों पर लिखे 'वेज बिरयानी' के पोस्टरों को स्वेच्छा से हटवाया और उनकी जगह 'वेज पुलाव' के नए पोस्टर व स्टिकर लगाए। अभियान से जुड़े लोगों का तर्क है कि हरिद्वार एक वैश्विक धार्मिक व सांस्कृतिक नगरी है, इसलिए यहां की प्राचीन पहचान और परंपराओं को अक्षुण्ण रखना बेहद जरूरी है।


बिरयानी शब्द से पैदा होती है मांसाहार की छवि: यश देव कौशिक

मुहिम की अगुवाई कर रहे यश देव कौशिक ने कहा कि मायापुरी और 'हर की पौड़ी' जैसे परम पवित्र क्षेत्रों में 'बिरयानी' शब्द के बजाय 'पुलाव' शब्द का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि 'बिरयानी' शब्द सुनते ही आम जनमानस के मन में अमूमन मांसाहारी भोजन (Non-Veg) की छवि कौंधती है, जबकि 'पुलाव' शब्द को शुद्ध शाकाहारी और भारतीय रसोई संस्कृति के अधिक करीब व स्वीकार्य माना जाता है।


जूना अखाड़े और माया देवी मंदिर के संतों का मिला खुला समर्थन

इस भाषाई और सांस्कृतिक बदलाव की मुहिम को जूना अखाड़े के बड़े संतों का भी खुला समर्थन प्राप्त हुआ है। प्रसिद्ध माया देवी मंदिर के मुख्य पुजारी भास्करपुरी महाराज ने इस कदम की सराहना करते हुए कहा कि शब्दों का मानव समाज और उसकी मानसिकता पर बहुत गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि 'बिरयानी' की जगह 'पुलाव' शब्द का प्रयोग किया जाएगा, तो लोगों की सोच और खानपान के प्रति धारणा में भी पवित्र बदलाव आएगा। उन्होंने इसे गंगा तट की मर्यादा बनाए रखने की दिशा में एक उत्तम प्रयास बताया।


कौमी एकता की मिसाल: मुस्लिम समुदाय भी अभियान के साथ खड़ा

इस पूरे अभियान की सबसे खूबसूरत और दिलचस्प बात यह रही कि इसमें मुस्लिम समाज के प्रबुद्ध लोगों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 'राष्ट्रीय सूफी संत फाउंडेशन' के अध्यक्ष नौशाद अली शबरी ने इस पर तकनीकी और भाषाई प्रकाश डालते हुए कहा कि वैसे तो बिरयानी और पुलाव दोनों ही शब्द फारसी मूल से जुड़े हैं, लेकिन पुलाव का संबंध भारतीय परंपरा और संस्कृत भाषा से भी मेल खाता है। उन्होंने कौमी एकता की मिसाल पेश करते हुए कहा कि यदि किसी शब्द के इस्तेमाल से बहुसंख्यक समाज की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं, तो उसका एक बेहतर और पवित्र विकल्प अपनाने में किसी को कोई हर्ज नहीं होना चाहिए।