सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को लगाईं कड़ी फटकार, सौंदर्यीकरण के नाम पर यह सब नहीं चलेगा... जानिए पूरा मामला

बिहार में विभिन्न जलाशयों को सौंदर्यीकरण के नाम पर आधुनिक रूप देने में कई बार उनके प्राकृतिक जैव संरचना को नुकसान पहुँचाने का मामला आता है, ऐसे ही एक मामले में अब सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को कड़ी फटकार लगाई है.

Supreme Court on  Darbhanga Ponds Beautification Project
Supreme Court on Darbhanga Ponds Beautification Project- फोटो : news4nation

Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने जलाशयों से जुड़े एक मामले को लेकर बिहार सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। दरभंगा के तीन ऐतिहासिक तालाबों—गंगासागर, दिग्घी और हराही—के सौंदर्यीकरण परियोजना को लेकर  शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "सौंदर्यीकरण के नाम पर जलाशयों को नहीं भरा जा सकता। पानी वाले हिस्से को हाथ मत लगाइए और अपने अधिकारियों को भी ऐसा करने से रोकिए।" कोर्ट ने राज्य सरकार को तत्काल प्रभाव से परियोजना से जुड़े उन कार्यों को रोकने का निर्देश दिया है, जिनसे तालाबों के क्षेत्रफल पर असर पड़ सकता है।


न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने 28 जुलाई को मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जब तक अदालत की अनुमति नहीं मिलती, तब तक जलाशयों से जुड़े किसी भी निर्माण या भराव का काम आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि तालाबों का मूल क्षेत्रफल किसी भी स्थिति में कम नहीं होना चाहिए।


क्या है मामला 

यह मामला दरभंगा की सामाजिक संस्था 'तालाब बचाओ अभियान' और कुछ सेवानिवृत्त शिक्षाविदों, पर्यावरणविदों तथा स्थानीय नागरिकों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि करीब 800 से 900 वर्ष पुराने ये तीनों तालाब दरभंगा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। उनका आरोप है कि सरकार सौंदर्यीकरण परियोजना के तहत तालाबों के कुछ हिस्सों को भरकर वहां सार्वजनिक सुविधाएं, मनोरंजन स्थल और दुकानें विकसित करना चाहती है, जो पर्यावरणीय नियमों और पूर्व में दिए गए न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन है।


सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि राज्य सरकार ने अपने हलफनामे में भी स्वीकार किया है कि परियोजना के तहत तालाबों के लगभग चार एकड़ हिस्से में मिट्टी भरने का प्रस्ताव है। उनका कहना था कि ये तीनों जलाशय संरक्षित आर्द्रभूमि (वेटलैंड) की श्रेणी में आते हैं, इसलिए इनके किनारे या भीतर निर्माण गतिविधियां नियमों के विरुद्ध हैं।


बिहार सरकार का तर्क 

वहीं बिहार सरकार ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि परियोजना का उद्देश्य तालाबों पर अतिक्रमण करना नहीं, बल्कि उनका संरक्षण और पुनर्जीवन करना है। सरकार के अनुसार, जहां मिट्टी भरने और स्टोन पिचिंग का कार्य किया जा रहा है, वह केवल कटाव रोकने और तटबंधों को मजबूत करने के लिए है। राज्य ने दावा किया कि यह कार्य बेहद सीमित क्षेत्र में किया जा रहा है और इससे जलाशयों के स्वरूप को कोई नुकसान नहीं होगा।


परियोजना में क्या होता 

सरकार ने यह भी बताया कि ₹100 करोड़ से अधिक की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत तालाबों के आसपास 11 स्नान घाट, पांच चेंजिंग रूम और सात शौचालय बनाए जाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा लोगों की बढ़ती आवाजाही को व्यवस्थित करने, स्वच्छता बनाए रखने और भविष्य में जलाशयों को कूड़ा फेंकने की जगह बनने से रोकने के लिए भी सार्वजनिक सुविधाएं विकसित की जा रही हैं।


बिहार सरकार से सहमत नहीं सुप्रीम कोर्ट 

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इन तर्कों से फिलहाल सहमति नहीं जताई और स्पष्ट किया कि जलाशयों के मूल स्वरूप से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। अदालत के इस आदेश के बाद परियोजना से जुड़े सभी विवादित कार्य फिलहाल रोक दिए गए हैं। अब इस मामले की अगली सुनवाई में राज्य सरकार को अपने कदमों का विस्तृत पक्ष अदालत के समक्ष रखना होगा।