प्रेस कार्ड या आतंकी नेटवर्क?इजराइल ने पेश किए होश उड़ाने वाले सबूत, राहतकर्मी पर हमास की मदद के गंभीर आरोप, भारत के एजेंटों पर भी उठने लगे सवाल

Israel Hamas War:। संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के राजदूत डेनी डेनन ने पुख्ता सबूतों और तस्वीरों के साथ वो खूनी सच दुनिया के सामने रखा है, जिसने इंसानी अधिकारों और प्रेस फ्रीडम की आड़ में चल रहे आतंकी नेटवर्क की धज्जियां उड़ा दी हैं।....

Press Card or Terror Link Israel Alleges Hamas Aid Network
कलमघसीट पत्रकार या आंतकवादी, खुलासा- फोटो : social Media

Israel Hamas War: क्या पत्रकारिता का पवित्र चोला किसी खूंखार आतंकी का सुरक्षित ठिकाना बन सकता है? संयुक्त राष्ट्र के गलियारों से एक ऐसी सनसनीखेज खबर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया की मीडिया और डिप्लोमेसी के होश उड़ा दिए हैं। इतिहास में पहली बार, इजराइल ने यूएन की दहलीज पर बैठकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया और संयुक्त राष्ट्र की ही एक एजेंसी को कटघरे में खड़ा कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के राजदूत डेनी डेनन ने पुख्ता सबूतों और तस्वीरों के साथ वो खूनी सच दुनिया के सामने रखा है, जिसने इंसानी अधिकारों और प्रेस फ्रीडम की आड़ में चल रहे आतंकी नेटवर्क की धज्जियां उड़ा दी हैं।

तस्वीरों का शर्मनाक सच

इजराइली राजदूत डेनी डेनन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो अलग-अलग टीवी चैनल्स के पत्रकारों की तस्वीरें पलट-पलट कर दिखाईं। ये तस्वीरें किसी को भी हैरत में डाल देंगी। एक तरफ वो तस्वीरें थीं जिनमें ये लोग माइक थामे पत्रकारिता का फर्ज निभाते दिख रहे थे, और दूसरी तरफ वही चेहरे भारी-भरकम हथियारों के साथ हमास के लड़ाकों के रूप में पोज दे रहे थे।

इजराइल के मुताबिक अल इस्तकलाल चैनल का यह तथाकथित पत्रकार असल में हमास का एक ट्रेंड आतंकी था, जो सुबह गाजा की मजलूमी का राग अलापता था और रात होते ही इजराइल पर रॉकेट दागने वाली टीम में शामिल हो जाता था।

 यह चेहरा अंतरराष्ट्रीय मीडिया जगत के सबसे विवादित और भारत विरोधी रुख रखने वाले चैनल अल जजीरा के लिए रिपोर्टिंग कर रहा था। इजराइल ने मुकम्मल दस्तावेजी सबूतों के साथ साबित किया कि अहमद विशा हमास के कमांडर रैंक का दहशतगर्द है, जिसे गाजा में प्रोपेगैंडा और फेक न्यूज फैलाने के लिए बकायदा प्लांट किया गया था।गौरतलब है कि अल जजीरा वही चैनल है जो समय-समय पर भारत के खिलाफ भी जहर उगलने और कश्मीर मसले पर मनगढ़ंत कहानियां गढ़ने के लिए कुख्यात रहा है। इजराइल के इस खुलासे ने साबित कर दिया है कि निष्पक्षता का दावा करने वाले इन संस्थानों के भीतर किस कदर 'दीमक' घुस चुकी है।

भारत के एजेंटों पर भी उठने लगे सवाल

इजराइल के इस आक्रामक कदम के बाद सोशल मीडिया पर एक नई बहस छिड़ गई है। भारत के सजग नागरिकों का कहना है कि यह बीमारी सिर्फ गाजा तक सीमित नहीं है। भारत में भी ऐसे कई कलमघसीट और कथित पत्रकार मौजूद हैं, जो चीन, पाकिस्तान और अमेरिकी डीप स्टेट (विदेशी ताकतों) के टुकड़ों पर पलते हैं। इनका काम दिन-रात भारत की संप्रभुता को गाली देना, देश के भीतर फेक न्यूज और सांप्रदायिक तनाव फैलाना है। इन्हें देश के जवानों की शहादत पर तो सांप सूंघ जाता है, लेकिन जब कोई आतंकी मारा जाता है, तो ये फौरन उसके 'ह्यूमन राइट्स' का रोना रोने लगते हैं।

यूएन का वर्कर या हमास का फिदायीन?

पत्रकारों के इस कत्ल-ए-आम वाले चेहरे को बेनकाब करने के बाद इजराइल ने संयुक्त राष्ट्र को भी आईना दिखाया। कुछ समय पहले गाजा में इजराइली हवाई हमले में संयुक्त राष्ट्र की रिलीफ एजेंसी का एक कर्मचारी मोहम्मद अबू इताबी मारा गया था। तब यूएन ने आसमान सिर पर उठा लिया था कि इजराइल ने उनके राहतकर्मी को मार डाला।इजराइल ने यूएन में सबूत पेश करते हुए बताया कि मोहम्मद अबू इताबी कोई मासूम रिलीफ वर्कर नहीं, बल्कि हमास का सक्रिय फिदायीन था, जो यूएन की सैलरी और पहचान पत्र का इस्तेमाल करके आतंकियों के लिए हथियारों की सप्लाई चेन संभाल रहा था।

क्या इजराइल ने सही किया?

सच्चाई और प्रोपेगैंडा के बीच की इस जंग-ए-मैदान में इजराइल ने जो किया, वह पूरी तरह जायज और सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी कदम है। जब तक प्रेस कार्ड और यूएन आईडी का इस्तेमाल मासूमों के खून से सने हाथों को छिपाने के लिए ढाल की तरह होता रहेगा, तब तक आतंकवाद का खात्मा नामुमकिन है। इजराइल ने दुनिया को दिखा दिया है कि जंग सिर्फ मोर्चे पर नहीं, बल्कि झूठ के उस साम्राज्य के खिलाफ भी लड़ी जानी चाहिए जो खबरों के जरिए फैलाया जाता है। भारत को भी इजराइल के इस 'आक्रामक मॉडल' से सबक लेते हुए अपने देशद्रोही तत्वों को इसी तरह बेनकाब करने की सख्त जरूरत है।