UGC New Act 2026: यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने की सख्त चोट, कहा- जाति के नाम पर कानून देश को पीछे ले जाएगा, 2012 के नियम बहाल

UGC New Act 2026: देश की शीर्ष अदालत ने यूजीसी के नए नियमों पर बड़ा और दूरगामी आदेश पारित करते हुए उन पर अंतरिम रोक लगा दी है।

SC scraps new UGC rules restores 2012 norms citing caste bia
यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने की सख्त चोट- फोटो : social Media

UGC New Act 2026: देश की शीर्ष अदालत ने यूजीसी के नए नियमों पर बड़ा और दूरगामी आदेश पारित करते हुए उन पर अंतरिम रोक  लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई तक वर्ष 2012 के यूजीसी नियम ही प्रभावी रहेंगे। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश  की अगुवाई वाली पीठ ने न केवल नियमों की वैधानिकता पर सवाल उठाए, बल्कि जाति आधारित विनियमन को लेकर तीखी संवैधानिक टिप्पणियां भी कीं। मामले की अगली सुनवाई के लिए 19 मार्च की तिथि निर्धारित की गई है और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया गया है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रथम दृष्टया यह माना कि नए नियमों की भाषा अस्पष्ट है और उसमें दुरुपयोग की गंभीर संभावना निहित है। पीठ ने टिप्पणी की कि आजादी के 75 वर्ष बाद भी यदि हम जातिविहीन समाज की दिशा में आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, तो यह अत्यंत चिंताजनक है। अदालत ने सवाल उठाया क्या हमने अब तक जो संवैधानिक उपलब्धियां हासिल की हैं, क्या हम उन्हें उल्टी दिशा में ले जा रहे हैं?

मुख्य न्यायाधीश ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई छात्र दक्षिण भारत से उत्तर भारत या उत्तर से दक्षिण किसी संस्थान में प्रवेश लेता है, तो उसे सामाजिक टिप्पणियों का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में यदि जाति की पहचान ही न हो, तो विवाद का समाधान किस नियम के तहत होगा यह स्पष्ट नहीं है। कोर्ट ने कहा कि भारत की एकता और विविधता शैक्षणिक परिसरों में दिखनी चाहिए, न कि वहां विभाजन की रेखाएं खींची जानी चाहिए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने यूजीसी रेगुलेशन के सेक्शन 3(सी) को सीधे तौर पर चुनौती दी। उनका तर्क था कि इस धारा में जातिगत भेदभाव की परिभाषा केवल SC, ST और OBC तक सीमित कर दी गई है, जबकि जनरल कैटेगरी को पूरी तरह बाहर रखा गया है। यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का स्पष्ट उल्लंघन है, क्योंकि इसमें पहले से ही एक वर्ग को दोषी मान लेने की प्रवृत्ति झलकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि विनियमन को शिक्षाविदों, न्यायविदों और सामाजिक विशेषज्ञों की समिति द्वारा पुनः परखा जाना चाहिए। कोर्ट ने यह भी आगाह किया कि यदि समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो इसके खतरनाक सामाजिक परिणाम होंगे और शैक्षणिक संस्थान विभाजन का केंद्र बन सकते हैं।

बहरहाल शीर्ष अदालत का यह आदेश स्पष्ट संकेत देता है कि संविधान की आत्मा समानता, एकता और समावेशन से समझौता किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगा। अब सबकी निगाहें 19 मार्च की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस संवेदनशील मुद्दे पर कानून की अंतिम दिशा तय होगी।