गौ हत्या की अनुमति देने की मांग, इस राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई याचिका

सरकार ने यह भी दलील दी है कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस बात पर टिप्पणी की कि क्या इस्लाम में गाय की कुर्बानी अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। राज्य का कहना है कि यह मुद्दा न तो किसी पक्ष ने उठाया था और न ही यह मूल विवाद का हिस्सा था।

Cow Slaughter
Cow Slaughter- फोटो : news4nation

Cow Slaughter : गौ हत्या को अनुमति देने से जुड़ी एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार ने दायर की है। इसमें गौ हत्या को लेकर मद्रास हाईकोर्ट के एक आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। राज्य सरकार ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर कहा है कि हाईकोर्ट का आदेश मौजूदा कानूनों के दायरे से बाहर है और इससे राज्य में गाय और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध जैसी स्थिति पैदा हो जाती है, जबकि ऐसा कोई प्रावधान कानून में नहीं है। दरअसल, मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 27 मई 2026 को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि बकरीद या किसी अन्य दिन राज्य में किसी भी गाय या बछड़े का वध न होने दिया जाए। इस आदेश के खिलाफ अब तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।


सरकार का कहना है कि मूल जनहित याचिका (PIL) का उद्देश्य केवल कोयंबटूर में बकरीद के दौरान सार्वजनिक स्थानों पर पशुओं की अवैध हत्या रोकना था। याचिकाकर्ता ने केवल यह मांग की थी कि पशुओं का वध अधिकृत बूचड़खानों में ही हो और सार्वजनिक स्थानों पर ऐसा न होने दिया जाए। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दायरे से आगे बढ़ते हुए पूरे राज्य में गाय और बछड़ों के वध पर रोक लगाने का निर्देश दे दिया। याचिका में तमिलनाडु सरकार ने कहा कि उसने पहले ही सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं। अधिकृत बूचड़खानों की पहचान की गई है, निरीक्षण के लिए अधिकारियों की तैनाती की गई है और कानून का पालन सुनिश्चित करने के लिए निगरानी बढ़ाई गई है।


राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 तथा अन्य संबंधित कानून पशुओं के वध को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं करते, बल्कि उसे नियमन (रेगुलेट) करते हैं। 1958 के कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में निर्धारित आयु पार कर चुकी और प्रजनन या कृषि कार्य के लिए अनुपयुक्त घोषित गायों के वध की अनुमति दी जा सकती है, बशर्ते कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।


सरकार ने यह भी दलील दी है कि हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस बात पर टिप्पणी की कि क्या इस्लाम में गाय की कुर्बानी अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। राज्य का कहना है कि यह मुद्दा न तो किसी पक्ष ने उठाया था और न ही यह मूल विवाद का हिस्सा था। इसलिए इस विषय पर न्यायालय की टिप्पणी आवश्यक नहीं थी।


इसके अलावा, तमिलनाडु सरकार ने हाईकोर्ट द्वारा 1976 के एक सरकारी आदेश का हवाला दिए जाने पर भी आपत्ति जताई है। सरकार का कहना है कि कार्यपालिका द्वारा जारी कोई सरकारी आदेश उन वैधानिक प्रावधानों से ऊपर नहीं हो सकता, जिनके तहत राज्य में पशु वध को नियंत्रित किया जाता है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि मद्रास हाईकोर्ट का आदेश कानूनी रूप से उचित था या फिर वह अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर दिया गया निर्देश था।