उज्जैन की अति प्राचीन सिंहपुरी होली: मान्यता ऐसी कि हर मुराद होती है पूरी, औरंगजेब ने भी दी थी परंपरा निभाने की इजाजत

मध्यप्रदेश राज्य में महाकाल कि नगरी के तौर पर विश्व प्रसिद्द उज्जैन के सिंहपुरी क्षेत्र में मनाई जाने वाली होलिका न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है.

Ujjain ancient Singhpuri Holi The belief is that every wish
उज्जैन की अति प्राचीन सिंहपुरी होली: मान्यता ऐसी कि हर मुराद होती है पूरी- फोटो : news 4 nation

मध्यप्रदेश राज्य में महाकाल कि नगरी के तौर पर विश्व प्रसिद्द उज्जैन के सिंहपुरी क्षेत्र में मनाई जाने वाली होलिका न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देती है. गुर्जरगौड़ ब्राह्मण समाज द्वारा वर्षों से निभाई जा रही इस परंपरा में होलिका को लगभग 5000 कंडों (उपलों) से भव्य रूप से सजाया जाता है. इस होलिका के सबसे ऊपरी हिस्से पर प्रहलाद के प्रतीक के रूप में एक लाल रंग का ध्वज स्थापित किया जाता है. 

राजा विक्रमादित्य और भृतहरि से जुड़ा इतिहास

इस स्थान पर होली मनाने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है और माना जाता है कि यह राजा विक्रमादित्य के काल से निरंतर चली आ रही है. लोक मान्यताओं के अनुसार, महान राजा भृतहरि भी स्वयं इस होली को तापने (अग्नि सेवन) के लिए सिंहपुरी आया करते थे. ज्योतिषविदों के अनुसार, पूर्णिमा के दिन वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा संपन्न होती है और ब्रह्म मुहूर्त में चकमक पत्थर की सहायता से अग्नि प्रज्वलित कर होलिका दहन किया जाता है.

औरंगजेब ने भी अक्षुण्ण रखी यह परंपरा

इतिहास के पन्नों में इस होली का उल्लेख औरंगजेब के शासनकाल के दौरान भी मिलता है. पंडित अमर गुरु डब्बावाला के अनुसार, जब औरंगजेब को इस प्राचीन परंपरा के बारे में पता चला, तो उसने स्थानीय लोगों से चर्चा कर इसे जीवित रखने और अक्षुण्ण बनाए रखने के प्रयास किए थे. इसके ऐतिहासिक दस्तावेज आज भी मौजूद हैं, जो दर्शाते हैं कि अलग मजहब का होने के बावजूद औरंगजेब ने इस परंपरा के निर्वहन में सहयोग किया था.

मान्यताएं और रंगपंचमी तक प्रज्वलित अग्नि

इस होली के प्रति भक्तों में अगाध श्रद्धा है; ऐसी मान्यता है कि यहाँ पूजन करने से हर मनोकामना पूर्ण होती है, जिसके चलते दूर-दूर से महिलाएं यहाँ पूजन सामग्री चढ़ाने आती हैं. होलिका दहन के बाद इसकी अग्नि रंगपंचमी तक प्रज्वलित रहती है. रंगपंचमी के पश्चात जब होली के अवशेष देखे जाते हैं, तो वे राख के बजाय अस्थियों के समान प्रतीत होते हैं, जिसे 'होलिका की अस्थियां' माना जाता है.