BATI हब की पहल: जनजातीय किसानों तक पहुंची आधुनिक कृषि तकनीक, बांका में किसान गोष्ठी और बीज वितरण संपन्न

BATI हब की पहल: जनजातीय किसानों तक पहुंची आधुनिक कृषि तकनीक,
BATI हब की पहल- फोटो : बाल मुकुंद कुमार

Bhagalpur : "BATI Hub एक ऐसी दूरदर्शी पहल है जो ‘Lab to Land’ और ‘Land to Lab’ के सिद्धांत पर कार्य कर रही है। हमारा उद्देश्य वैज्ञानिक तकनीक एवं जनजातीय पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से सतत आजीविका, पोषण सुरक्षा एवं आत्मनिर्भर जनजातीय समुदाय का निर्माण करना है।" यह बात बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर द्वारा संचालित विशेष परियोजना के तहत आयोजित कार्यक्रम में उभरकर सामने आई। शुक्रवार को बांका जिले के बेलहर प्रखंड के श्रीनगर गांव तथा फुल्लीडुमर प्रखंड की झिझिया पंचायत में भव्य किसान गोष्ठी एवं बीज वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें 120 जनजातीय किसान परिवारों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया।


स्थानीय ज्ञान का दस्तावेजीकरण और 'लैब टू लैंड' पर जोर

परियोजना की प्रमुख अन्वेषक डॉ. प्रीति प्रियदर्शिनी (सहायक प्राध्यापक-सह-कनिष्ठ वैज्ञानिक, कृषि प्रसार विभाग) ने बताया कि BATI Hub विश्वविद्यालय की एक महत्वाकांक्षी योजना है। यह परियोजना विशेष रूप से जनजातीय समुदायों तक वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को पहुँचाने के साथ-साथ उनके पारंपरिक एवं स्थानीय (Indigenous) ज्ञान का दस्तावेजीकरण कर रही है। इसके माध्यम से सहभागितापूर्ण (Participatory) तकनीकों का विकास किया जा रहा है, जिससे किसानों के अपने अनुभव सीधे वैज्ञानिकों की लैब तक पहुँच रहे हैं।


पोषण वाटिका से सुधरा स्वास्थ्य: आहार विविधता 22% से बढ़कर हुई 80%

सब्जी विज्ञान विभाग की वैज्ञानिक डॉ. राजकुमारी आशा देवी एवं डॉ. अमृता कुमारी ने किसानों को शारदीय ऋतु की सब्जियों जैसे टमाटर, नेनुआ, भिंडी, अगेती फूलगोभी, बोड़ा, बैंगन एवं करेला की वैज्ञानिक खेती, बीजोपचार और कीट नियंत्रण का प्रशिक्षण दिया। प्रशिक्षण के बाद इन फसलों के बीज भी वितरित किए गए। डॉ. प्रियदर्शिनी ने एक सुखद आंकड़ा साझा करते हुए बताया कि पिछले वर्ष की प्रेरणा से जनजातीय परिवारों में पोषण वाटिका (Nutritional Garden) स्थापित हुई, जिससे उनकी आहार विविधता (Dietary Diversity) में क्रांतिकारी सुधार हुआ है। पूर्व में जहां केवल 22 प्रतिशत परिवार मध्यम आहार विविधता की श्रेणी में थे, वहीं अब यह संख्या बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत हो गई है।


कम पानी में बंपर पैदावार देगी 'सबौर हर्षित' धान, शुरू हुआ 'सीड हब मॉडल'

एल-नीनो वर्ष की चुनौतियों और सूखे जैसी स्थिति से निपटने के लिए किसानों को कम पानी और कम समय में तैयार होने वाली धान की उन्नत किस्म सबौर हर्षित’ का बीज उपलब्ध कराया गया। एग्रोनॉमी विभाग की वैज्ञानिक डॉ. गायत्री कुमारी ने धान उत्पादन की 'गुड पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेज' पर ट्रेनिंग दी। इसके साथ ही समुदाय में तकनीक के विस्तार के लिए सीड हब मॉडल’ की शुरुआत की गई है। इसके तहत हर किसान को 1 किलो प्रमाणित बीज मिला है, और फसल कटाई के बाद वे 2 किलो बीज परियोजना को वापस लौटाएंगे, जिसे अगले चरण में अन्य किसानों को दिया जाएगा।


पलायन रोकने का हथियार बनेगी आधुनिक खेती

परियोजना के तहत क्षेत्र में प्रवासन (Migration) पर किए गए अध्ययन में सामने आया कि सिंचाई की कमी और कृषि से अनियमित आय के कारण यहाँ के युवा गुजरात, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों की ओर पलायन करते हैं। चर्चा के दौरान ग्रामीणों ने इच्छा जताई कि यदि गांव में ही आधुनिक कृषि प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण बीज और तकनीकी सहायता मिलती रहे, तो वे खेती को ही अपनी आजीविका का मुख्य जरिया बनाएंगे। इससे न केवल युवाओं का पलायन थमेगा, बल्कि वे महानगरों में होने वाली दिक्कतों से भी बच सकेंगे।


महुआ के तेल और लड्डू पर तैयार हो रही है विशेष डॉक्यूमेंट्री

जनजातीय समाज ने अपने पारंपरिक ज्ञान को साझा करते हुए बताया कि महुआ उनकी आजीविका का बड़ा स्रोत है। वे इसके बीज के तेल का उपयोग घी के विकल्प के रूप में और महुआ के लड्डू का उपयोग आयरन व पोषण के लिए करते हैं। विश्वविद्यालय अब इस महुआ तेल का वैज्ञानिक परीक्षण कराकर इसके मूल्य संवर्धन (Value Addition) और उद्यमिता विकास पर काम कर रहा है। इस ज्ञान को सहेजने के लिए बिहार कृषि विश्वविद्यालय द्वारा एक विशेष डॉक्यूमेंट्री भी तैयार की जा रही है।

अपने संबोधन के समापन पर डॉ. प्रीति प्रियदर्शिनी ने भावुक होते हुए कहा कि “BATI Hub जनजातीय समाज में एक ‘बाती’ (दीपक) की तरह ज्ञान और तकनीक का प्रकाश फैलाने का प्रयास है, जिसमें सबौर विश्वविद्यालय सारथी की भूमिका निभा रहा है।”

बालमुकुंद की रिपोर्ट