Kargil Vijay Diwas: शहादत को सलाम, वादों को विराम! कारगिल के अमर वीर के लिए किए गए सरकारी वादे 27 साल बाद भी अधूरे, आज भी इंसाफ और सम्मान का परिवार कर रहा है इंतजार

26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने कारगिल की दुर्गम चोटियों पर दुश्मन के नापाक इरादों को ध्वस्त कर तिरंगा फहराया था। देश के सैकड़ों वीर जवानों ने अपने प्राण न्योछावर किए। उन्हीं अमर सपूतों में बिहार के सारण जिले के शहीद विशुनी राय शामिल थे...

Kargil Martyr Vishuni Rai
27 साल बाद भी कारगिल के शहीद परिवार को किसका है इंतज़ार और क्या है दर्द...- फोटो : reporter

Kargil Vijay Diwas:  कारगिल विजय दिवस देश के लिए गर्व, शौर्य और बलिदान का प्रतीक है। 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने कारगिल की दुर्गम चोटियों पर दुश्मन के नापाक इरादों को ध्वस्त कर तिरंगा फहराया था। इस ऐतिहासिक विजय में देश के सैकड़ों वीर जवानों ने अपने प्राण न्योछावर किए। उन्हीं अमर सपूतों में बिहार के सारण जिले के शहीद विशुनी राय भी शामिल थे, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। लेकिन विडंबना यह है कि उनकी शहादत को 27 वर्ष बीत जाने के बाद भी उनके सम्मान में किए गए अधिकांश सरकारी वादे आज तक पूरे नहीं हो सके हैं।

कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ पर जहां पूरा देश अपने वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है, वहीं सारण जिले के मकेर प्रखंड स्थित बथुई गांव में हर साल की तरह इस बार भी गर्व के साथ-साथ अधूरे वादों का दर्द ताजा हो गया। शहीद के परिजनों की आंखों में आज भी वही उम्मीद है, जो वर्ष 1999 में नेताओं के आश्वासनों के समय जगी थी।

जब कारगिल युद्ध में वीरगति प्राप्त करने के बाद शहीद विशुनी राय का पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव पहुंचा था, तब पूरा बिहार शोक में डूब गया था। उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, स्थानीय सांसद राजीव प्रताप रूडी सहित कई मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी गांव पहुंचे थे। शहीद को श्रद्धांजलि देते हुए मंच से कई बड़ी घोषणाएं की गई थीं। लोगों को भरोसा दिलाया गया था कि शहीद के सम्मान में गांव का नामकरण होगा, मकेर चौक का नाम कारगिल चौक रखा जाएगा, शहीद की प्रतिमा स्थापित की जाएगी, सड़क का नाम शहीद विशुनी राय पथ होगा और परिवार को पटना में जमीन उपलब्ध कराई जाएगी।

लेकिन वक्त गुजरता गया और वे तमाम घोषणाएं सरकारी फाइलों में सिमटकर रह गईं। आज भी बथुई गांव में शहीद की प्रतिमा नहीं है, मकेर चौक का नाम नहीं बदला, सड़क का नामकरण नहीं हुआ और गांव को भी शहीद के नाम से नहीं जोड़ा गया। पटना में जमीन देने का वादा भी अधूरा रह गया।

शहीद की पत्नी सुशीला देवी बताती हैं कि उस समय नेताओं ने भरोसा दिया था कि परिवार को कभी किसी तरह की परेशानी नहीं होगी। लेकिन वर्षों बाद भी अधिकांश वादे पूरे नहीं हुए। भारत सरकार से मिलने वाली सुविधाओं के सहारे किसी तरह परिवार का जीवन चल रहा है, लेकिन राज्य सरकार की ओर से किए गए कई वादे आज भी अधूरे हैं। बच्चों की पढ़ाई के लिए उन्हें पटना में किराए के मकान में रहकर संघर्ष करना पड़ा। बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुका है, लेकिन अब भी बेहतर रोजगार की तलाश में है। सरकारी नौकरी का आश्वासन भी सिर्फ आश्वासन बनकर रह गया।

शहीद के पुत्र रवीश राज कहते हैं कि अगर मकेर चौक पर उनके पिता की प्रतिमा लग जाती तो वह सिर्फ एक मूर्ति नहीं होती, बल्कि हजारों युवाओं के लिए देशभक्ति और सेना में जाने की प्रेरणा बनती। लेकिन हर साल कारगिल विजय दिवस पर वही चर्चा होती है, वही सवाल पूछे जाते हैं और जवाब भी वही रहता है-आज तक कोई वादा पूरा नहीं हुआ।परिजनों का कहना है कि राहत के नाम पर उन्हें पेट्रोल पंप जरूर मिला, लेकिन उसका संचालन भी आसान नहीं था। वर्तमान में उसे लीज पर देकर किसी तरह आय का साधन बनाया गया है। उनका मानना है कि शहीद का सम्मान केवल पुष्पांजलि, भाषण और समारोहों से नहीं होता, बल्कि उनके परिवार से किए गए वादों को निभाने से होता है।

स्थानीय ग्रामीण भी मानते हैं कि यदि सरकार शहीद विशुनी राय के नाम पर स्मारक, प्रतिमा या चौक का निर्माण कर देती तो यह केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे सारण जिले और बिहार का सम्मान होता। उनका कहना है कि चुनावी मंचों से किए गए वादों की तरह शहीद के परिवार से किए गए आश्वासन भी समय के साथ धुंधले पड़ गए।

आज जब पूरा देश कारगिल विजय दिवस पर अपने अमर वीरों को नमन कर रहा है, तब बथुई गांव का यह परिवार भी अपने वीर सपूत को श्रद्धासुमन अर्पित कर रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि उनके लिए यह दिन गर्व के साथ-साथ अधूरे वादों की कसक भी लेकर आता है। परिवार की एक ही मांग है कि वर्षों पहले किए गए वादों को पूरा किया जाए। यही शहीद विशुनी राय के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा संदेश देगा।

रिपोर्ट- धर्मेंद्र