Bihar News: सात सौ वर्ष पुरानी पंजी परंपरा पर अस्तित्व का संकट, मिथिलांचल की वंशावली व्यवस्था में घटते पंजीकार, युवाओं की बेरुखी बनी चुनौती

Bihar News: मिथिलांचल की सामाजिक संरचना की आधारशिला मानी जाने वाली ऐतिहासिक पंजी प्रथा आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। ...

700 Year Old Panji Tradition Faces Survival Crisis
सात सौ वर्ष पुरानी पंजी परंपरा पर अस्तित्व का संकट- फोटो : reporter

Bihar News:  मिथिलांचल की सामाजिक संरचना की आधारशिला मानी जाने वाली ऐतिहासिक पंजी प्रथा आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। सदियों से विवाह-संस्कार का मार्गदर्शन करने वाली यह वंशावली परंपरा आधुनिकता, बदलती जीवनशैली और युवाओं की घटती दिलचस्पी के कारण विलुप्ति के कगार पर पहुंचती दिख रही है।

मिथिलांचल में विशेषकर मैथिल ब्राह्मणों और कर्ण कायस्थ समाज के बीच प्रचलित यह प्रथा लगभग सात सौ वर्ष पुरानी मानी जाती है। पंजीकारों के अनुसार इसकी औपचारिक शुरुआत 1310 या 1327 ईस्वी के आसपास कर्नाट वंश के राजा हरिसिंह देव के समय हुई थी। तब से विवाह तय करने से पहले वंशावली का मिलान अनिवार्य परंपरा बन गया।

पंजीकार अरविंद मल्लिक बताते हैं कि इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य रक्त संबंधों से बचाव और आनुवंशिक शुद्धता सुनिश्चित करना है। विवाह से पूर्व युवक की सात पीढ़ियों और युवती की पांच पीढ़ियों का मिलान किया जाता है। यदि कोई रक्त संबंध नहीं पाया जाता, तो ‘सिद्धांत’ नामक प्रमाणपत्र जारी होता है, जिसके बिना विवाह को सामाजिक मान्यता नहीं मिलती।

पंजीकारों के पास ताड़पत्रों और पुराने दस्तावेजों पर लगभग 700 वर्षों का हस्तलिखित रिकॉर्ड सुरक्षित है। किंतु आय के स्थायी स्रोत के अभाव में नई पीढ़ी इस पेशे से दूरी बना रही है। युवा आधुनिक रोजगार और व्यवसायों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे पंजीकारों की संख्या में निरंतर कमी आई है।

सरकारी स्तर पर अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहन और व्यक्तिगत पसंद को कानूनी सुरक्षा मिलने से भी इस परंपरा की प्रासंगिकता प्रभावित हुई है। बड़ी संख्या में मैथिल परिवारों का महानगरों और विदेशों में बसना भी एक कारण है।

मधुबनी जिले का सौराठ गांव आज भी इस परंपरा का प्रमुख केंद्र है, जहां वार्षिक वैवाहिक सभा में पंजीकार वंशावली का मिलान करते हैं। बावजूद इसके, बदलते दौर में इस प्राचीन व्यवस्था के संरक्षण और डिजिटलीकरण की मांग तेज हो रही है, ताकि यह ऐतिहासिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।

रिपोर्ट- वरुण कुमार ठाकुर