वर्दी दागदार पर सुशासन है मेहरबान! घूसखोर इंस्पेक्टर को एसपी ने पाया दोषी फिर भी मिलती रही महत्वपूर्ण तैनाती! सुबूतों संग जानिए सच उड़ जायेंगे होश
आमतौर पर भ्रष्टाचार में संलिप्त पाए जाने पर एक्शन होता है लेकिन इनके मामले में उलटा हुआ।दोषी पाए जाने के बाद भी उक्त इंस्पेक्टर को जिले के महत्वपूर्ण तैनाती मिलती रही। इस 'मेहरबानी' ने विभाग के भीतर ही चर्चा का माहौल गर्म कर दिया है।
बिहार पुलिस में 'सुशासन' और जीरो टॉलरेंस के दावों के बीच एक घूसखोर इंस्पेक्टर पर विभाग की मेहरबानी ने खाकी की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भ्रष्टाचार के आरोप में दोषी पाए जाने और सर्विस बुक में तमाम निंदनों के बावजूद, उक्त अधिकारी को बार-बार मलाईदार और महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती दी जा रही है। यह स्थिति पुलिस विभाग के उन दावों की पोल खोलती है जिसमें पारदर्शिता और ईमानदारी की बात की जाती है। सवाल उठता है कि आखिर वह कौन सी अदृश्य शक्ति है जो एक प्रमाणित रूप से दागी इंस्पेक्टर को बार-बार सुरक्षा कवच प्रदान कर रही है?\
प्रशासनिक स्थानांतरण और पटना से विदाई
इस इंस्पेक्टर का सफर राजधानी पटना से ही विवादों में रहा है। पटना जिला बल में तैनाती के दौरान बीरेन्द्र चौधरी के संदिग्ध आचरण और क्रियाकलापों की वजह से उन्हें प्रशासनिक दृष्टिकोण से जिले से बाहर कर दिया गया था। पटना प्रक्षेत्रादेश संख्या 124/17 और ज्ञापांक 1263 (दिनांक 16-05-17) के माध्यम से उनका स्थानांतरण नवादा जिला बल में किया गया था। आमतौर पर ऐसे तबादले सजा के तौर पर देखे जाते हैं, लेकिन नवादा पहुँचने के बाद भी अधिकारी की कार्यशैली में कोई सुधार नहीं दिखा।

सिरदला थाना और 17 हजार की रिश्वत का कांड
नवादा जिला बल में योगदान देने के बाद, जब बीरेन्द्र चौधरी सिरदला थाना के थानाध्यक्ष के पद पर तैनात थे, तब उन पर अनुशासनहीनता और स्वेच्छाचारिता के गंभीर आरोप लगे। विभागीय जांच संख्या 97/2020 में यह खुलासा हुआ कि जिला खनन कार्यालय द्वारा एक ट्रक (JH02N-8385) को विमुक्त करने का आदेश मिलने के बावजूद, उन्होंने वाहन मालिक से 17,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी。 यह वसूली उनके सहयोगी सिपाही राजमणि के माध्यम से की जा रही थी, जिसे निगरानी टीम ने रंगे हाथों गिरफ्तार किया था और इस संबंध में निगरानी थाना कांड संख्या 04/2019 दर्ज किया गया।
एसपी की कार्रवाई और वेतन वृद्धि पर रोक
इस गंभीर मामले में जांच के उपरांत, नवादा की तत्कालीन पुलिस अधीक्षक सुश्री धुरत सायली सावलाराम (भा.पु.से.) ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने मामले की गंभीरता को देखते हुए बीरेन्द्र चौधरी को पूर्णतः दोषी पाया और अंतिम दंड आदेश पारित किया। दंड के स्वरूप उनकी 03 (तीन) वर्ष की वेतन वृद्धि रोकने (समपधरण) का आदेश दिया गया, जिसे जिलादेश संख्या 1479/2021 (दिनांक 10-12-21) के माध्यम से प्रभावी किया गया। यह दंड अधिकारी की सर्विस बुक पर एक काला धब्बा माना जाता है।

विभाग में असंतोष और छवि पर लगता दाग
हैरानी की बात यह है कि इतने गंभीर आरोपों और प्रमाणित दंड के बावजूद, हाल ही में इस इंस्पेक्टर को एक अति महत्वपूर्ण थाने के पर्यवेक्षी अधिकारी के रूप में तैनात कर दिया गया है। जब जिले के कप्तान खुद किसी अधिकारी को भ्रष्टाचार का दोषी मान चुके हों, तो उसके बाद भी उसे मलाईदार पोस्टिंग देना पुलिस की छवि को धूमिल करता है। विभाग के भीतर इस पक्षपातपूर्ण रवैये ने अन्य ईमानदार अधिकारियों और कर्मियों के बीच गहरा असंतोष पैदा कर दिया है, जिससे पुलिस की कार्यशैली पर जनता का भरोसा कम हो रहा है।