Bihar News: गया की माटी में उलट-फेर, कम बारिश-तपिश के बीच मशरूम - श्रीअन्न से ऐसे बदल रही किसानों की तकदीर

Bihar News:आसमान से बरसती आग और बारिश की बेरुखी के बावजूद बिहार का गया जिला आज मुल्क भर के किसानों के लिए एक रोशन रौशनी और नई मिसाल बनकर उभर रहा है।...

Gaya agriculture
बदल रही किसानों की तकदीर- फोटो : IPRD

Bihar News:आसमान से बरसती आग और बारिश की बेरुखी के बावजूद बिहार का गया जिला आज देश भर के किसानों के लिए एक रोशन रौशनी और नई मिसाल बनकर उभर रहा है। मौसम की दुश्वारियों और सख्त गर्मी को मात देते हुए यहां के जांबाज किसान खेती-किसानी की एक नई इबारत लिख रहे हैं, जिसमें मशरूम की काश्त और मोटे अनाजों (श्रीअन्न) की बहार ने किसानों की तदीर बदलकर रख दी है।

बांके बाजार प्रखंड के दिघासिन गांव की रहने वाली कंचन कुमारी इसकी जिंदा मिसाल हैं। कभी पारंपरिक खेती की तंगी और पानी की किल्लत से जूझने वाली कंचन ने कृषि विज्ञान केंद्र, आमस से प्रशिक्षण लेकर अपनी किस्मत का रुख मोड़ लिया। शुरुआत महज 25 बैग ऑयस्टर मशरूम से हुई थी, जिससे उन्हें 120 किलो की बेहतरीन पैदावार मिली। हौसला बढ़ा तो उन्होंने बटन और बुथिया रोफेड मशरूम को भी अपनी खेती का हिस्सा बना लिया। आज वह साल के 7 से 8 महीने मशरूम उगाकर सालाना लगभग 95,000 रुपये की कमाई कर रही हैं और अपनी मेहनत के बल पर कर्मयोगी पुरस्कार से भी नवाजी जा चुकी हैं।

खास बात यह है कि गया जिला प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना के क्रियान्वयन में पूरे देश में अव्वल रहा है। केंद्रीय बजट 2025-26 के तहत शुरू की गई इस योजना का मकसद देश के उन पिछड़े और कम उत्पादकता वाले जिलों को संवारना है, जहां कुदरती चुनौतियां ज्यादा हैं। गया में भीषण गर्मी और पानी की भारी कमी के बावजूद मशरूम आज एक जिला एक उत्पाद (ODOP) योजना का नायाब नगीना बन चुका है। जिले के 50 हजार से अधिक परिवार इस कारोबार से जुड़कर आर्थिक तौर पर खुद को मजबूत कर रहे हैं।

सिर्फ मशरूम ही नहीं, बल्कि कम पानी की खपत वाले श्रीअन्न (मोटे अनाज) की खेती ने भी इस इलाके में क्रांति ला दी है। टनकुप्पा प्रखंड के मायापुर में बने बिहार सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर मिलेट्स वैल्यू चेन में रागी, कोदो, बाजरा और सांवा जैसी फसलों पर बेहतरीन रिसर्च और ट्रेनिंग चल रही है, जहां देश भर के किसानों को आधुनिक तकनीक सिखाई जा रही है। इसके साथ ही, गर्मियों में खाली रहने वाली बंजर जमीनों पर मूंग, उड़द और तिल की बुआई से न सिर्फ जमीन की उर्वरता बढ़ रही है, बल्कि किसानों की आमदनी में भी इजाफा हो रहा है।

पराली यानी फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका वैज्ञानिक इस्तेमाल कर मशरूम की खेती करना इस बात का सबूत है कि गया के किसान कुदरत की हर चुनौती को हुनर के दम पर कामयाबी के रास्ते में बदल रहे हैं।