Thave Durga Temple: एक ही दिन, एक मंदिर, दो मंत्री के लिए दो पैमाने! थावे दुर्गा धाम में आस्था बनाम ओहदा को लेकर भेदभाव!, गर्भगृह में मां के दर्शन पर उठे सवाल

Thave Durga Temple: थावे दुर्गा मंदिर जैसे पवित्र शक्तिपीठ में पूजा-अर्चना के दौरान भेदभाव बरता गया, और यह भेदभाव किसी आम ज़ायरीन के साथ नहीं, बल्कि बिहार सरकार के एक मंत्री के साथ हुआ।...

Why Different Rules for Ministers at Thawe Durga Temple
थावे दुर्गा मंदिर में पूजा में भेदभाव- फोटो : reporter

Thave Durga Temple:गोपालगंज से इस वक्त एक निहायत संगीन और नाज़ुक मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ धार्मिक मर्यादाओं बल्कि सियासी बराबरी और इंसाफ़ के उसूलों को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि थावे दुर्गा मंदिर जैसे पवित्र शक्तिपीठ में पूजा-अर्चना के दौरान भेदभाव बरता गया, और यह भेदभाव किसी आम लोग के साथ नहीं, बल्कि बिहार सरकार के एक मंत्री के साथ हुआ।

बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक कुमार जब मां दुर्गा के दरबार में हाज़िरी लगाने पहुंचे, तो उन्होंने विधिवत पूजा की, माथा टेका, लेकिन आरोप है कि उन्हें मंदिर के गर्भगृह में दाख़िले की इजाज़त नहीं दी गई। बताया जा रहा है कि नियमों का हवाला देकर उन्हें बाहर ही रोक दिया गया। सवाल यह है कि अगर नियम इतने सख़्त थे, तो कुछ ही देर बाद वही नियम कैसे ढीले पड़ गए?

करीब आधे घंटे बाद ग्रामीण विकास मंत्री अशोक चौधरी मंदिर पहुंचे। उनके साथ उनके दामाद सायन कुणाल भी थे, जो बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद से जुड़े हैं। आरोप है कि जैसे ही वे मंदिर परिसर में दाख़िल हुए, पुजारी और मंदिर न्यास समिति के पदाधिकारी खुद आगे बढ़े, उन्हें गर्भगृह के भीतर ले गए और पूरे विधि-विधान से पूजा कराई गई। अब यही वह बिंदु है, जहां से सियासत की ज़ुबान में सवाल खड़े हो रहे हैं।

एक ही मंदिर, एक ही दिन, एक ही समय और एक ही देवी का दरबार तो फिर नियम अलग-अलग क्यों? क्या गर्भगृह में प्रवेश श्रद्धा से तय होता है या फिर ओहदे, रसूख़ और न्यास से जुड़े ताल्लुक़ से? क्या यह ताक़त और पहचान का फ़ायदा उठाने का मामला है, या फिर मंदिर प्रशासन की नीयत पर ही सवालिया निशान है?

कई सामाजिक और धार्मिक संगठनों का कहना है कि मंदिर इबादत और भक्ति का मुक़ाम होता है, यहां छोटा-बड़ा, मंत्री-ग़रीब नहीं होना चाहिए। अगर नियम हैं, तो सबके लिए बराबर होने चाहिए। वहीं दूसरी तरफ़ यह सवाल भी ज़ोर पकड़ रहा है कि क्या मंदिर न्यास समिति पर सियासी असर हावी हो चुका है?

फिलहाल मंदिर न्यास समिति और पुजारियों की तरफ़ से कोई वाज़ेह बयान सामने नहीं आया है। यह ख़ामोशी ही इस पूरे मामले को और मशकूक बना रही है। अब सबकी निगाहें जवाब पर टिकी हैं। अगर जल्द ही सच सामने नहीं आया, तो थावे दुर्गा मंदिर का यह मामला आस्था से निकलकर एक बड़ा सियासी बवाल बन सकता है।

रिपोर्ट-नमोनारायण मिश्रा