Jamui Railway land: जमुई में बुलडोजर का खौफ, रेलवे नोटिस से सैकड़ों परिवारों पर बेघर होने का संकट

Jamui Railway land: बिहार के जमुई में रेलवे नोटिस के बाद महादलित परिवार बेघर होने के कगार पर है। इस दौरान स्थायी आवास और जमीन की मांग तेज हो गई है।

Jamui Railway land
रेलवे की कार्रवाई से हलचल- फोटो : social media

Jamui Railway land: बिहार में पांच दर्जन से ज्यादा महादलित परिवार अपने रहने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हो गए हैं। इन परिवारों को अब तक कोई सहारा नहीं मिला है। कई परिवारों की कई पीढ़ियां रेलवे परिसर में बने अस्थायी घरों में रहकर गुजर चुकी हैं, लेकिन अब उन्हें वहां से हटने का नोटिस दिया जा रहा है।

हर परिवार की आंखों में अपने घर को बचाने की चिंता साफ दिखाई दे रही है। इन परिवारों के 200 से ज्यादा लोगों के नाम मतदाता सूची में दर्ज हैं और इन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिल रहा है। करीब 20 साल पहले 97 परिवारों को बसाने के लिए सरकार ने जमीन का पर्चा भी दिया था, लेकिन आज तक उन्हें वहां बसाने या पक्का घर देने की दिशा में कोई काम नहीं हुआ। हालात यह हैं कि जिस जमीन पर इन परिवारों को बसाना था, उस पर अब दूसरे लोगों ने कब्जा कर लिया है। इस वजह से सरकार का मकसद पूरा नहीं हो सका और ये परिवार आज भी बिना स्थायी घर के रह रहे हैं।

रेलवे की तरफ से दिए गए नोटिस

रेलवे की तरफ से दिए गए नोटिस के बाद इन परिवारों ने दानापुर के डीआरएम, आईओडब्ल्यू, विधायक, नगर परिषद के मुख्य पार्षद और अंबेडकर विकास मंच के लोगों से मदद की गुहार लगाई है, लेकिन अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। रेल प्रशासन ने रेलवे परिसर में बनी करीब 40 झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे महादलित परिवारों को 6 अप्रैल तक जगह खाली करने का आदेश दिया है। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो 7 अप्रैल से बुलडोजर चलाने की चेतावनी दी गई है। इसके साथ ही 142 पुराने और खाली पड़े रेलवे क्वार्टर को भी तोड़ा जा रहा है, जिनमें करीब तीन दर्जन परिवार रह रहे हैं। बिना किसी दूसरी व्यवस्था के इतने लोगों को हटाने पर हर तरफ से सवाल उठ रहे हैं।

आंबेडकर विकास मंच के लोगों ने क्या कहा?

आंबेडकर विकास मंच के लोगों का कहना है कि एक तरफ सरकार महादलित परिवारों को बसाने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ रेलवे प्रशासन के इस कदम से उनके साथ अन्याय हो रहा है। यह भी सच है कि रेलवे परिसर और नगर परिषद क्षेत्र को साफ रखने में इन परिवारों की बड़ी भूमिका रही है। अगर ये लोग यहां से हट जाते हैं, तो सफाई व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है। कई बार रेल पुलिस और स्थानीय पुलिस भी इनकी मदद लेती है, जैसे हादसों में शव हटाने जैसे कठिन कामों में।

पीड़ित परिवारों का बयान

इन परिवारों में रहने वाले दिलीप, नवीन, उमेश, तुलसी और गीता जैसे लोगों का कहना है कि उनका पूरा जीवन यहीं बीत गया। अब जब वे बूढ़े हो रहे हैं, तो उन्हें घर खाली करने को कहा जा रहा है। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल है कि वे अब कहां जाएंगे। वे बताते हैं कि करीब 50 साल से वे यहीं रह रहे हैं और अब उनके छोटे-छोटे बच्चों के साथ सड़क पर रहने की नौबत आ गई है। उनका कहना है कि जब तक उन्हें रहने के लिए स्थायी जगह नहीं मिलती, वे यहां से नहीं जाएंगे। उन्होंने जिला प्रशासन से मदद की मांग की है।परिवारों का कहना है कि उन्हें शक्तिघाट में जो जमीन दी गई थी, उस पर अब दूसरे लोगों ने कब्जा कर लिया है। यह जगह शहर से करीब 5 किलोमीटर दूर है। सभी परिवार 30 मार्च को अंचल अधिकारी से मिलकर अपनी जमीन वापस दिलाने की मांग करेंगे। उन्होंने साफ कहा है कि अगर उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो वे आंदोलन करने को मजबूर होंगे।