बिहार को दो-दो मुख्यमंत्री देने वाला बांकीपुर विधानसभा में इस बार कौन जीत रहे, भाजपा के सामने कितने सफल हुए प्रशांत किशोर, जानिए

केबी सहाय 1962 में बिहार के मुख्यमंत्री बने। इसी तरह बिहार की पहली गैर कांग्रेसी सरकार के मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद भी इसी सीट से 1967 में जीते थे।

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Bankipur Bypoll - फोटो : news4nation

Bankipur Bypoll : राजधानी पटना का बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र बिहार की राजनीति का ऐसा चुनावी मैदान रहा है, जिसने समय-समय पर राज्य को बड़े नेता और मुख्यमंत्री दिए हैं। यही वजह है कि इस सीट को केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि बिहार की राजनीतिक दिशा तय करने वाली सीटों में गिना जाता है। गुरुवार, 30 जुलाई को इस प्रतिष्ठित सीट पर उपचुनाव के लिए शांतिपूर्ण मतदान संपन्न हो गया। अब सभी की निगाहें 3 अगस्त को आने वाले नतीजों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि बांकीपुर एक बार फिर नया राजनीतिक इतिहास लिखेगा या नहीं।


बांकीपुर का राजनीतिक इतिहास बेहद समृद्ध रहा है। जब इस सीट का नाम पटना पश्चिम हुआ करता था, तब वर्ष 1962 में यहां से जीत दर्ज करने वाले के.बी. सहाय बिहार के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 1967 में इसी सीट से चुनाव जीतने वाले महामाया प्रसाद सिन्हा ने बिहार में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का नेतृत्व किया और मुख्यमंत्री बने। वर्ष 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर ठाकुर प्रसाद ने यहां से जीत हासिल की। ठाकुर प्रसाद बिहार में भाजपा की मजबूत नींव रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। उनके पुत्र रविशंकर प्रसाद बाद में केंद्र सरकार में मंत्री बने और वर्तमान में पटना साहिब से सांसद हैं।


1995 से यह सीट लगातार भाजपा के कब्जे में है। उस चुनाव में भाजपा के नवीन किशोर सिन्हा ने जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2005 से उनके पुत्र नितिन नवीन लगातार इस सीट का प्रतिनिधित्व करते रहे। हाल ही में नितिन नवीन के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उनके इस्तीफे से यह सीट खाली हुई, जिसके कारण उपचुनाव कराना पड़ा।


उपचुनाव कई मायने 

इस बार का उपचुनाव कई मायनों में बेहद अहम माना गया। कुल 25 उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की रेखा गुप्ता और जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के बीच माना गया। चुनाव प्रचार के दौरान सभी प्रमुख दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया।


यह चुनाव भाजपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि बांकीपुर पिछले तीन दशकों से उसका सबसे मजबूत शहरी गढ़ रहा है। यदि पार्टी इस सीट को बरकरार रखती है तो यह उसके संगठन और नेतृत्व पर जनता के भरोसे की पुष्टि मानी जाएगी। वहीं, प्रशांत किशोर के लिए यह चुनाव उनकी राजनीतिक यात्रा की सबसे बड़ी परीक्षा माना गया। जन सुराज की स्थापना के बाद पहली बार उन्होंने स्वयं चुनावी मैदान में उतरकर अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता को परखने की कोशिश की। ऐसे में इस सीट पर उनका प्रदर्शन यह तय करेगा कि जन सुराज बिहार की राजनीति में कितनी प्रभावी चुनौती बन पाती है।


भाजपा के सामने कितने सफल हुए प्रशांत किशोर?

बांकीपुर उपचुनाव को प्रशांत किशोर के लिए उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता की सबसे बड़ी परीक्षा माना गया। जन सुराज की स्थापना के बाद पहली बार उन्होंने स्वयं चुनाव मैदान में उतरकर भाजपा के तीन दशक पुराने मजबूत गढ़ को चुनौती दी। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने भ्रष्टाचार, शिक्षा, रोजगार और शहरी विकास जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया और पूरे अभियान की कमान खुद संभाली। दूसरी ओर भाजपा ने भी इस सीट को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानते हुए अपना पूरा संगठन और शीर्ष नेतृत्व मैदान में उतार दिया। ऐसे में यह चुनाव केवल एक विधानसभा सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि भाजपा की संगठनात्मक ताकत और प्रशांत किशोर की जनस्वीकृति के बीच सीधा मुकाबला बन गया। अब 3 अगस्त को आने वाले नतीजे ही तय करेंगे कि प्रशांत किशोर भाजपा के अभेद्य किले में कितनी सेंध लगा पाए और क्या वे खुद को बिहार की राजनीति में एक प्रभावशाली विकल्प के रूप में स्थापित करने में सफल रहे।


राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांकीपुर का चुनाव केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक तस्वीर का संकेत भी है। अब सबकी नजरें 3 अगस्त पर हैं, जब मतगणना के बाद यह साफ हो जाएगा कि भाजपा अपना अभेद्य गढ़ बचाने में सफल रही या प्रशांत किशोर और विपक्ष ने इस सीट पर नया राजनीतिक अध्याय लिख दिया।