Bharat Tiwari Encounter: सरेंडर, गोलियां और सियासी तूफान,भरत तिवारी एनकाउंटर की वो कहानी जिसने बिहार की राजनीति और पुलिसिया कार्रवाई पर खड़े कर दिए बड़े सवाल, पढ़िए 7 दिन में कैसे पलटी पूरी कहानी
Bharat Tiwari Encounter: आज भरत तिवारी एनकाउंटर केवल एक पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है। यह कानून, पुलिसिया जवाबदेही, मानवाधिकार और न्यायिक प्रक्रिया की परीक्षा बन चुका है।
Bharat Tiwari Encounter: भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में 17 जून 2026 सुबह 9:30 बजे कैमरे के सामने जो कुछ हुआ, उसने कुछ ही घंटों में पूरे बिहार को दो हिस्सों में बांट दिया। एक तरफ पुलिस थी, जो इसे कानून के खिलाफ खड़े एक आरोपी के खिलाफ कार्रवाई बता रही थी, तो दूसरी तरफ परिजन और ग्रामीण थे, जो इसे खुली हत्या और फर्जी एनकाउंटर करार दे रहे थे।
भरत भूषण तिवारी हाथ में पिस्टल लिए पुलिस अधिकारियों से बातचीत कर रहा था। पूरा घटनाक्रम मोबाइल कैमरे में रिकॉर्ड हो रहा था। वीडियो में पुलिस अधिकारी उसकी बातें सुनते दिखाई देते हैं। बातचीत आगे बढ़ती है और फिर वह क्षण आता है जिसने पूरे मामले को विवादों के भंवर में धकेल दिया। भरत पिस्टल नीचे फेंक देता है। इसके कुछ ही पल बाद गोलियां चलती हैं। भरत के दोनों घुटनों और जांघों में चार गोलियां लगती हैं। गंभीर रूप से घायल भरत को अस्पताल ले जाया जाता है, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो जाती है। शुरुआत में पुलिस ने इसे मुठभेड़ बताते हुए अपनी कार्रवाई को जायज ठहराया। दावा किया गया कि भरत ने पुलिस टीम पर 15 से 20 राउंड फायरिंग की थी, जिसके जवाब में आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी। लेकिन जैसे ही लाइव वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, कहानी का दूसरा पहलू सामने आने लगा। वीडियो में भरत हथियार फेंकता दिखाई दिया, जिसके बाद सवाल उठने लगे कि यदि उसने आत्मसमर्पण कर दिया था तो फिर गोलियां क्यों चलीं?
इस पूरे घटनाक्रम की पटकथा एक दिन पहले यानी 16 जून को लिखी जा चुकी थी। सोशल मीडिया पर अवैध पिस्टल के साथ भरत की तस्वीर वायरल हुई थी। पुलिस हथियार बरामद करने उसके घर पहुंची, लेकिन वहां भरत ने कथित तौर पर पुलिस पर पिस्टल तान दी और धमकी दी। पुलिस टीम बिना गिरफ्तारी लौट गई। इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद खाकी की कार्यशैली पर सवाल उठे और अगले दिन भारी पुलिस बल के साथ दोबारा कार्रवाई की गई। सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा हुआ जब 16 जून को पुलिस अधिकारियों ने भरत को मानसिक रूप से अस्वस्थ बताते हुए उसके इलाज की बात कही थी। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने कहा था कि उसे मानसिक आरोग्यशाला भेजने पर विचार किया जा रहा है। लेकिन अगले ही दिन उसी युवक के खिलाफ सशस्त्र कार्रवाई हुई और उसकी मौत हो गई। यही विरोधाभास अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है।
घटना के बाद पुलिस ने तीन अलग-अलग एफआईआर दर्ज कीं। पहली प्राथमिकी में भरत, उसके पिता काशीनाथ तिवारी और भाई चंदन तिवारी को आरोपी बनाया गया। दूसरी एफआईआर में पुलिस पर फायरिंग और सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने के आरोप लगाए गए। तीसरी प्राथमिकी हाईवे जाम और पथराव को लेकर दर्ज की गई, जिसमें ग्रामीणों और स्थानीय लोगों को नामजद किया गया।
भरत की मौत के बाद आक्रोश फूट पड़ा। 18 जून को परिजनों और ग्रामीणों ने बक्सर-पटना राष्ट्रीय राजमार्ग-922 को शव रखकर जाम कर दिया। करीब छह घंटे तक इलाका तनाव और टकराव का केंद्र बना रहा। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की, पथराव और लाठीचार्ज की घटनाएं हुईं। भीड़ हत्या का मुकदमा दर्ज करने, दोषी पुलिसकर्मियों की बर्खास्तगी, सरकारी नौकरी और आर्थिक मुआवजे की मांग कर रही थी। मामला तब और संवेदनशील हो गया जब सत्ता पक्ष के नेताओं ने भी पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। विपक्ष ने इसे फर्जी एनकाउंटर बताया, वहीं सत्तारूढ़ गठबंधन के कई नेताओं ने भी पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराईं। बढ़ते दबाव के बीच सरकार ने पहले संबंधित पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया और बाद में हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से न्यायिक जांच कराने की घोषणा की।
घटनाक्रम का सबसे बड़ा मोड़ 23 जून को आया, जब भरत की मां की शिकायत पर एसडीपीओ, तत्कालीन थानाध्यक्ष और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या की एफआईआर दर्ज कर ली गई। यह इस पूरे मामले की चौथी प्राथमिकी है और पहली बार पुलिस अधिकारियों को सीधे कठघरे में खड़ा किया गया है।
आज भरत तिवारी एनकाउंटर केवल एक पुलिस कार्रवाई का मामला नहीं रह गया है। यह कानून, पुलिसिया जवाबदेही, मानवाधिकार और न्यायिक प्रक्रिया की परीक्षा बन चुका है। एक वायरल वीडियो ने सरकारी दावों और जनविश्वास के बीच खड़ी उस खाई को उजागर कर दिया है, जिसका सच अब न्यायिक जांच के बाद ही सामने आएगा। पूरे बिहार की निगाहें इस सवाल पर टिकी हैं कि आखिर 17 जून की सुबह बिलौटी गांव में हुआ क्या था मुठभेड़, आत्मरक्षा या फिर एक ऐसा रहस्य, जिसकी परतें अभी खुलनी बाकी हैं।मामला तूल पकड़ने के बाद यह सरकार के गले की हड़़्ी बन गया है तो पुलिस के आला अपसरान भी अब कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं।