Bihar Higher Education: बिहार में कॉलेज पुनर्गठन के प्रस्ताव पर कर्मचारी महासंघ ने फूंका विरोध का बिगुल, सरकार को दी आंदोलन की चेतावनी, बताया विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर हमला
Bihar Higher Education: बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में प्रस्तावित बड़े बदलाव को लेकर सियासी और शैक्षणिक घमासान तेज होता दिख रहा है।
Bihar Higher Education: बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था में प्रस्तावित बड़े बदलाव को लेकर सियासी और शैक्षणिक घमासान तेज होता दिख रहा है। राज्य सरकार द्वारा स्नातक महाविद्यालयों के पुनर्गठन और विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन के प्रस्ताव के खिलाफ बिहार राज्य विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय कर्मचारी महासंघ ने मोर्चा खोल दिया है। महासंघ ने सरकार की प्रस्तावित व्यवस्था को विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर सीधा प्रहार बताते हुए इसे उच्च शिक्षा के भविष्य के लिए गंभीर खतरा करार दिया है। साथ ही चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने प्रस्ताव वापस नहीं लिया तो लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन का आगाज किया जाएगा।
महासंघ के संरक्षक गंगा प्रसाद झा, अध्यक्ष वेंकटेश कुमार, महामंत्री रोहित कुमार समेत विनोद कुमार, संजीव कुमार, दीपक कुमार और त्रिपुरारी प्रसाद ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि विश्वविद्यालय केवल परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था नहीं, बल्कि शिक्षण, शोध, पाठ्यक्रम निर्माण, परीक्षा संचालन, गुणवत्ता नियंत्रण और अकादमिक विकास का केंद्रीय स्तंभ हैं। यदि स्नातक महाविद्यालयों को विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक एवं शैक्षणिक नियंत्रण से हटाकर सीधे उच्च शिक्षा विभाग के अधीन कर दिया जाता है, तो विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल औपचारिक संस्था बनकर रह जाएगी।
महासंघ का कहना है कि इस प्रस्तावित संशोधन से विश्वविद्यालयों की अकादमिक परिषद, अध्ययन बोर्ड, संकाय, परीक्षा समिति और अन्य वैधानिक निकायों की प्रभावशीलता कमजोर होगी। वर्षों से विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के बीच बना शैक्षणिक तालमेल टूट सकता है, जिससे पाठ्यक्रम निर्माण, परीक्षा प्रणाली, शोध गतिविधियों, मूल्यांकन प्रक्रिया और शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।महासंघ ने सरकार के प्रस्ताव को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) की मूल भावना के भी विपरीत बताया। संगठन का तर्क है कि नई शिक्षा नीति बहुविषयक, स्वायत्त और विश्वविद्यालय आधारित उच्च शिक्षा संस्थानों को मजबूत करने पर जोर देती है, जबकि बिहार सरकार का प्रस्ताव कॉलेजों को विश्वविद्यालयों से अलग कर विभागीय नियंत्रण में लाने की दिशा में दिखाई देता है।
कर्मचारी महासंघ ने आशंका जताई कि यदि यह व्यवस्था लागू हुई तो विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता कमजोर होगी, शिक्षकों और कर्मचारियों की सेवा संबंधी समस्याएं बढ़ेंगी तथा सबसे अधिक नुकसान विद्यार्थियों के शैक्षणिक हितों को होगा। संगठन का कहना है कि विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों की समन्वित व्यवस्था ही उच्च शिक्षा में गुणवत्ता, जवाबदेही और पारदर्शिता की सबसे मजबूत बुनियाद रही है।महासंघ ने राज्य सरकार से मांग की है कि प्रस्तावित पुनर्गठन और विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन पर तत्काल पुनर्विचार किया जाए। साथ ही विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, कर्मचारियों, शिक्षा विशेषज्ञों, छात्र प्रतिनिधियों और अन्य हितधारकों के साथ व्यापक विमर्श के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाए।
महासंघ ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि उच्च शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करने वाला यह प्रस्ताव आगे बढ़ाया गया, तो शिक्षक और कर्मचारी संगठन मिलकर चरणबद्ध आंदोलनात्मक रणनीति तैयार करेंगे। उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, शैक्षणिक उत्कृष्टता और विद्यार्थियों के हितों की रक्षा के लिए हर लोकतांत्रिक और संवैधानिक लड़ाई लड़ी जाएगी।
रिपोर्ट- धीरेंद्र कुमार