बिहार विधान परिषद चुनाव 2026, सियासत के इस सियासी दंगल में 8 सीटो पर किसकी होगी फतह? किसी प्रतिष्ठा लगी है दाव पर, सियासी समीकरणों का क्या है गुणा गणित, पढ़िए

Bihar MLC Election: पटना से लेकर जिलों तक, बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर होने वाले इस चुनावी रण ने राजनैतिक गलियारों की फिजाओं में एक अजीब सी गर्माहट पैदा कर दी है।

Bihar MLC Election 2026
बिहार विधान परिषद चुनाव- सियासत का रण, दंगल और इम्तिहान- फोटो : AI-generated photo

Bihar MLC Election: सूबे की सियासत में इन दिनों गजब का उबाल है। पटना से लेकर जिलों तक, बिहार विधान परिषद की 8 सीटों पर होने वाले इस चुनावी रण ने राजनैतिक गलियारों की फिजाओं में एक अजीब सी गर्माहट पैदा कर दी है। सत्ता के गलियारों में हलचल तेज है, क्योंकि यह मुकाबला सिर्फ जीत-हार का नहीं, बल्कि तमाम सियासी दिग्गजों के वजूद, साख और भविष्य का एक कड़ा इम्तिहान है। एक तरफ एनडीए के सामने अपनी हुकूमत और पुरानी विरासत को बरकरार रखने का भारी दबाव है, तो दूसरी तरफ महागठबंधन के पास विधानसभा चुनाव के जख्मों से उबरने और अपनी सियासी जमीन तलाशने की बड़ी चुनौती आन पड़ी है।

इस बीच, बांकीपुर उपचुनाव की शानदार जीत से लबरेज और हौसले से बुलंद प्रशांत किशोर ने तमाम सीटों पर अपने नुमाइंदे उतारकर मुकाबले को त्रिकोणीय और बेहद दिलचस्प बना दिया है। राजनीति के इस मैदान में अपनों की बगावत और भीतरघात के अंदेशे ने हर दल की नींद उड़ा रखी है, जिससे यह कयास लगाना गलत नहीं होगा कि आने वाले दिनों में यहां बड़ा खेला होने से इंकार नहीं किया जा सकता। स्नातक और शिक्षकों के इस विशेष चुनाव में मुद्दों की फेहरिस्त लंबी है, लेकिन सबसे बड़ा और धारदार मुद्दा युवाओं के लिए नौकरी और रोजगार का ही है, जिस पर हर नेता अपनी सियासत की रोटियां सेकने की जुगत में लगा है।

अपनों की बगावत और टिकटों का ऊंट किस करवट बैठेगा?

बीजेपी को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख दलों ने अपने सूरमाओं की फेहरिस्त जारी कर दी है।लेकिन असली ड्रामा पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में देखने को मिल रहा है, जहां जेडीयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार की मुश्किलें मोकामा के बाहुबली विधायक अनंत सिंह ने बढ़ा दी हैं। अनंत सिंह ने नीरज कुमार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकते हुए अनुज सिंह को मैदान में उतार दिया है और इत्तेफाक देखिए कि उसी अनुज सिंह को जन सुराज का टिकट भी थमा दिया गया है। दूसरी तरफ, पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में पांच बार के अजेय भाजपा विधायक नवल यादव के मुकाबले राजद ने जेडीयू के पूर्व विधायक डॉ. संजीव सिंह को उतारकर मुकाबले को कांटे का बना दिया है। तीस साल की सत्ता विरोधी लहर का यह साया कहीं न कहीं बीजेपी उम्मीदवार के माथे पर चिंता की लकीरें खींच रहा है।

 जेडीयू  ने चार सीटों पर अपने पत्ते खोल दिए हैं, तो वहीं प्रशांत किशोर ने पहले पांच और फिर तीन यानी कुल आठों सीटों पर अपने मजबूत उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है। राजद  ने भी अपनी रणनीति के तहत छह सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि एक सीट कांग्रेस के खाते में मदन मोहन झा के लिए और एक सीट सीपीआई के खाते में प्रो. संजय कुमार सिंह के लिए छोड़ी गई है।

प्रतिष्ठा का सवाल और सियासी समीकरणों का गणित

सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद से विधान परिषद के उपचुनाव और अन्य चुनावों में एनडीए को लगातार कई झटके झेलने पड़े हैं। खास तौर पर बांकीपुर उपचुनाव की हार ने तो बीजेपी की चूलें हिला दी हैं, क्योंकि यह सीट कभी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का गढ़ हुआ करती थी। ऐसे में, मुख्यमंत्री और बीजेपी के लिए विधान परिषद की ये आठों सीटें साख और प्रतिष्ठा का खुला विषय बन चुकी हैं। कम से कम अपनी मौजूदा विनिंग सीटों को महफूज रखना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।

दूसरी तरफ, महागठबंधन के लिए यह चुनाव वजूद की लड़ाई है। विधान परिषद की 8 सीटों में से फिलहाल दो सीटों पर महागठबंधन का कब्जा जरूर है दरभंगा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के मदन मोहन झा और तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से सीपीआई के संजय सिंह डटे हुए हैं लेकिन आरजेडी के खाते में फिलहाल एक भी सीट नहीं है। ऐसे में, राजद इस चुनाव में अपना खाता खोलने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है। वहीं, प्रशांत किशोर भी अपनी पार्टी जन सुराज के जरिए विधानसभा की नाकामी को भुलाकर इस विधान परिषद के रण में अपनी पहली बड़ी राजनीतिक जीत का झंडा गाड़ने के लिए बेताब हैं।

कसमकस, वादे और मतदाताओं का रुख

तमाम दल अपने-अपने कसीदे पढ़ रहे हैं और मतदाताओं को रिझाने के लिए नए-नए पैंतरे अपना रहे हैं। प्रशांत किशोर ने शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के विकास के लिए एक मुकम्मल एजेंडा पेश कर दिया है। वह ग्रेजुएट वोटरों से नौकरी और रोजगार के नाम पर जन सुराज को एक मौका देने की अपील कर रहे हैं, तो शिक्षकों की दुश्वारियों को दूर करने का भी पुरजोर वादा कर रहे हैं।

भले ही बीजेपी ने अभी आधिकारिक तौर पर अपने सभी उम्मीदवारों के नामों की फाइनल घोषणा नहीं की हो, लेकिन अंदरखाने यह साफ हो चुका है कि मैदान में कौन-कौन ताल ठोकेगा। पटना शिक्षक सीट से लगातार पांच बार जीत का परचम लहराने वाले नवल यादव का दावा है कि इस बार भी वे छक्का जड़कर नया रिकॉर्ड बनाएंगे। उधर, जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने एनडीए का एजेंडा साफ करते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नीतीश मॉडल के तहत सूबे में विकास की गाड़ी सरपट दौड़ रही है। शिक्षकों और युवाओं की उम्मीदों पर खरा उतरना ही उनका मुख्य ध्येय है। इसके विपरीत, राजद का यह तर्क है कि नौकरी और रोजगार हमेशा से उनका मुख्य हथियार रहा है और तेजस्वी यादव के कार्यकाल में युवाओं के लिए किए गए कामों का सीधा फायदा उन्हें इस चुनाव में मिलेगा।

क्या होगा अंजाम?

राजनीतिक पंडितों का कहना है कि भले ही कागजों पर एनडीए के तमाम घटक दल एकजुट नजर आ रहे हों, लेकिन अंदरूनी कलह, बागी तेवर और पटना स्नातक सीट पर अनंत सिंह और नीरज कुमार का विवाद इस गठबंधन की मुश्किलें बढ़ा सकता है। दूसरी तरफ, महागठबंधन में भी आपसी समन्वय की भारी कमी खल रही है। बहरहाल इन तमाम सियासी उठापटक के बीच, प्रशांत किशोर की धमाकेदार इंट्री ने इस मुकाबले को पूरी तरह त्रिकोणीय बना दिया है। सत्ता में होने के कारण एनडीए का पलड़ा भारी जरूर है, लेकिन हालिया झटकों के बाद अपनी साख बचाना उनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि सूबे के ये प्रबुद्ध मतदाता यानी स्नातक और शिक्षक किस पर अपना भरोसा जताते हैं और सियासत का यह ऊंट किस करवट बैठता है।

हीरेश कुमार