Bihar Education Department:बिहार शिक्षा विभाग में शहाबुद्दीन के घर बेधड़क छापेमारी करने वाले CK अनिल की एंट्री, पहली बैठक में हीं दिया ये दो टूक चेतावनी
Bihar Education Department: बिहार की सम्राट चौधरी सरकार ने प्रशासनिक महकमे में बड़ा फेरबदल करते हुए 1991 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सीके अनिल को शिक्षा विभाग का नया अपर मुख्य सचिव नियुक्त किया है।...
Bihar Education Department: बिहार की सम्राट चौधरी सरकार ने प्रशासनिक महकमे में बड़ा फेरबदल करते हुए 1991 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सीके अनिल को शिक्षा विभाग का नया अपर मुख्य सचिव नियुक्त किया है। उनकी तैनाती को महज एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि शिक्षा विभाग की कार्यशैली में बड़े बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। कड़क मिजाज, सख्त फैसलों और अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए पहचाने जाने वाले सीके अनिल की एंट्री से विभाग में हलचल तेज है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अब शिक्षा विभाग में मंत्री की राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ अफसरशाही की सख्ती भी दिखाई देगी?
शहाबुद्दीन के घर छापेमारी से चर्चा में आए थे सीके अनिल
सीके अनिल की पहचान एक ऐसे अधिकारी की रही है, जो प्रशासनिक कार्रवाई में किसी तरह की ढिलाई पसंद नहीं करते। वर्ष 2004 में जब वह सीवान के जिलाधिकारी थे, तब उन्होंने बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन के प्रतापपुर स्थित आवास पर पुलिस बल के साथ छापेमारी कराई थी। इस कार्रवाई में बड़ी मात्रा में अवैध हथियार बरामद होने की बात सामने आई थी। इस घटना ने उन्हें बिहार की नौकरशाही में एक सख्त और बेखौफ अधिकारी के रूप में पहचान दिलाई। अब करीब दो दशक बाद शिक्षा विभाग की कमान संभालने के साथ उनके पुराने तेवरों की चर्चा फिर शुरू हो गई है।
पहली बैठक में भ्रष्टाचार पर दो टूक चेतावनी
सीके अनिल ने 30 अक्टूबर को शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव का पदभार संभाला। पदभार ग्रहण करने के बाद अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ हुई पहली बैठक में ही उन्होंने अपना रुख साफ कर दिया। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने की बात कही। उनका दो टूक संदेश था कि भ्रष्टाचार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और ऐसे मामलों में सीधे बर्खास्तगी तक की कार्रवाई होगी। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी सेवा में अब एक साल बचा है और वह देखेंगे कि अधिकारियों के साथ कितने दिन तक काम करते हैं। उनकी इस तल्ख टिप्पणी को विभागीय व्यवस्था में अनुशासन कायम करने की चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
HRMS घोटाले से शिक्षक संगठनों तक, कई चुनौतियां
शिक्षा विभाग इस वक्त कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रहा है। HRMS पोर्टल के जरिए वेतन भुगतान में कथित गड़बड़ियों, फर्जी शिक्षकों के नाम पर भुगतान, अधिकारियों की लापरवाही और विभागीय पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इसके अलावा शिक्षक संगठनों की मांगें भी सरकार के लिए चुनौती बनी हुई हैं। सातवें वेतनमान, सेवा संबंधी समस्याओं, तबादले और अन्य सुविधाओं को लेकर शिक्षक संगठन लगातार आवाज उठा रहे हैं। शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी ने शिक्षकों की समस्याओं के समाधान और सातवें वेतनमान की मांग पर विचार के लिए समिति बनाने की बात कही थी। ऐसे में सीके अनिल के सामने दोहरी जिम्मेदारी होगी। एक तरफ शिक्षकों की जायज मांगों पर कार्रवाई करनी होगी, तो दूसरी तरफ विभागीय कामकाज में बाधा डालने वाली गतिविधियों और अनियमितताओं पर लगाम लगानी होगी।
राजस्व विभाग में भी दिखा चुके हैं सख्त तेवर
सीके अनिल का प्रशासनिक अंदाज इससे पहले राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में भी चर्चा का विषय बना था। उनके कार्यकाल में लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई, अंचल कार्यालयों की जवाबदेही और विभागीय व्यवस्था को दुरुस्त करने पर जोर दिया गया था। इस दौरान कई अंचल अधिकारियों को निलंबित भी किया गया। इसके बाद विभागीय मंत्री के साथ उनके मतभेदों की चर्चा सामने आई। अंचल और राजस्व अधिकारियों की हड़ताल के दौरान सरकार ने सख्त रुख अपनाया था। हड़ताल पर गए अधिकारियों को सरकारी वाहन, लैपटॉप और विभागीय रिकॉर्ड से जुड़ी चाबियां वापस करने का निर्देश दिया गया। साथ ही काम नहीं तो वेतन नहीं का आदेश भी लागू किया गया। इस घटनाक्रम से विभागीय कामकाज प्रभावित हुआ। बाद में सीके अनिल को राजस्व विभाग से हटाकर बिहार राज्य योजना पर्षद में परामर्शी बना दिया गया। विभाग की जिम्मेदारी सचिव जय सिंह को सौंप दी गई।
क्या शिक्षा मंत्री पर बढ़ेगा प्रशासनिक दबाव?
सीके अनिल की नियुक्ति के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शिक्षा विभाग में प्रशासनिक पकड़ मजबूत करने के लिए यह फैसला लिया है? क्या विधान परिषद शिक्षक निर्वाचन के नतीजों के बाद विभाग में सख्त अधिकारी की जरूरत महसूस की गई? या फिर यह महज विभागीय अनियमितताओं को रोकने और कामकाज में तेजी लाने की कवायद है? शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी अब तक शिक्षकों के बीच अपनी सक्रियता दिखाते रहे हैं। एमएलसी चुनाव के दौरान भी उन्होंने कई घोषणाएं की थीं। ऐसे में मंत्री की नीतिगत प्राथमिकताओं और अपर मुख्य सचिव की प्रशासनिक कार्यशैली के बीच बेहतर तालमेल बेहद जरूरी होगा।
167 दिनों बाद शिक्षा विभाग को मिला पूर्णकालिक ACS
शिक्षा विभाग में अपर मुख्य सचिव का पद 167 दिनों तक खाली रहने के बाद सीके अनिल को यह जिम्मेदारी मिली है। 15 मई 2026 को तत्कालीन अपर मुख्य सचिव डॉ. बी. राजेंद्र को विभाग की जिम्मेदारी से मुक्त किया गया था। इसके बाद 16 मई को 2007 बैच के आईएएस अधिकारी विनोद सिंह गुंजियाल ने शिक्षा एवं खेल विभाग के सचिव का कार्यभार संभाला। 22 मई को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शिक्षा विभाग की समीक्षा बैठक की थी। इसके बाद 18 अगस्त को एक और प्रशासनिक फेरबदल हुआ। इसमें 2010 बैच के आईएएस अधिकारी राजीव रौशन को शिक्षा विभाग का सचिव बनाया गया, जबकि विनोद सिंह गुंजियाल को समाज कल्याण विभाग की जिम्मेदारी सौंप दी गई।आखिरकार 29 अक्टूबर को 1991 बैच के सीके अनिल को विभाग का अपर मुख्य सचिव नियुक्त किया गया।
अब देखने वाली बात होगी कि सीके अनिल की सख्त कार्यशैली शिक्षा विभाग में कितना बदलाव ला पाती है। क्या भ्रष्टाचार, वेतन भुगतान की गड़बड़ियों और प्रशासनिक लापरवाही पर प्रभावी लगाम लगेगी या फिर मंत्री और अफसर के बीच तालमेल की नई चुनौती खड़ी होगी? फिलहाल उनकी नियुक्ति ने बिहार की सियासत और नौकरशाही में एक नई चर्चा जरूर छेड़ दी है।