शिक्षा विभाग में 'सेटिंग' का खेल: भ्रष्टाचार के आरोपी पूर्व DEO पर मेहरबानी, निलंबन अवधि को 'ऑन ड्यूटी' मानने पर उठे सवाल

बिहार शिक्षा विभाग का अजीबोगरीब खेल: सस्पेंड हुए पूर्व डीईओ को मिली क्लीन चिट, घर बैठे रहने की अवधि को विभाग ने माना 'ऑन ड्यूटी'। सरकारी खजाने पर बढ़ा बोझ।

शिक्षा विभाग में 'सेटिंग' का खेल: भ्रष्टाचार के आरोपी पूर्व

Patna - बिहार का शिक्षा विभाग एक बार फिर अपने ही विरोधाभासी फैसलों के कारण विवादों के घेरे में है। विभाग ने तत्कालीन जिला शिक्षा पदाधिकारी समर बहादुर सिंह को गंभीर आरोपों के तहत निलंबित किया था, लेकिन अब उन्हें न केवल बहाल कर दिया गया है, बल्कि उनकी निलंबन अवधि को भी 'ड्यूटी' मान लिया गया है। यह आदेश स्पष्ट करता है कि विभाग में पहले बिना ठोस सबूत के कार्रवाई की हड़बड़ी दिखाई जाती है और बाद में अंदरूनी 'सेटिंग' के जरिए दागियों को पाक-साफ बता दिया जाता है।

जांच के नाम पर खानापूर्ति और फाइलों की बाजीगरी

दस्तावेजों के मुताबिक, समर बहादुर सिंह के खिलाफ नवंबर 2024 में अनुशासनिक कार्रवाई शुरू की गई थी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, जांच पदाधिकारी ने उनके विरुद्ध सभी आरोपों को "अप्रमाणित" घोषित कर दिया। यह सवाल उठता है कि अगर आरोप इतने ही कमजोर थे, तो उन्हें निलंबित कर विभाग की किरकिरी क्यों कराई गई? जानकारों का मानना है कि यह जांच केवल एक औपचारिक खानापूर्ति थी, ताकि दागी अधिकारी को सुरक्षित रास्ता (Safe Passage) दिया जा सके।

बिना काम किए वेतन: जनता की गाढ़ी कमाई पर डाका

इस आदेश का सबसे शर्मनाक पहलू बिंदु संख्या-6 है। विभाग ने निर्णय लिया है कि 28.11.2024 से 30.06.2025 तक की निलंबन अवधि को "कर्तव्य पर बिताई गई अवधि" माना जाएगा। इसका मतलब है कि श्री सिंह महीनों तक घर पर आराम करते रहे और अब सरकार उन्हें उस अवधि का पूरा वेतन और भत्ता देगी। एक तरफ राज्य के नियोजित शिक्षक अपने हक के लिए सड़कों पर लाठियां खा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों के निलंबन और बहाली के इस 'तमाशे' में सरकारी खजाने को बेरहमी से लूटा जा रहा है।

रसूखदारों को इनाम: मलाईदार पद पर दोबारा तैनाती

निलंबन मुक्त होने के तुरंत बाद समर बहादुर सिंह को राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), पटना में संयुक्त निदेशक के महत्वपूर्ण पद पर तैनात कर दिया गया। यह विभाग की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। जिस अधिकारी पर भ्रष्टाचार या अनियमितता के आरोप लगे हों, उसे पुनः इतने प्रभाव वाले पद पर बैठाना यह दर्शाता है कि विभाग में नैतिकता की जगह रसूख और पैरवी को प्राथमिकता दी जा रही है। यह आदेश उन ईमानदार कर्मियों के गाल पर तमाचा है जो निष्ठा से काम करते हैं।

जवाबदेही शून्य: कौन लेगा इस प्रशासनिक विफलता की जिम्मेदारी?

10 अप्रैल 2026 को जारी यह आदेश बिहार के प्रशासनिक तंत्र के खोखलेपन की कहानी चीख-चीख कर कह रहा है। यदि जांच अधिकारी को कोई सबूत नहीं मिले, तो क्या उन अधिकारियों पर कार्रवाई होगी जिन्होंने गलत तरीके से निलंबन की फाइल आगे बढ़ाई थी? या फिर यह मान लिया जाए कि शिक्षा विभाग में निलंबन केवल कुछ समय के लिए किसी को रास्ते से हटाने का एक 'पॉलिटिकल टूल' बन चुका है? जब तक इस तरह की 'रिवर्स गियर' वाली कार्रवाई पर रोक नहीं लगेगी, विभाग की साख रसातल में ही रहेगी।