बिहार में तबादलों पर सरकार का ब्रेक, अब CMO की मंजूरी के बिना नहीं होगी मनचाही पोस्टिंग, जानिए नए नियम

Bihar Transfer Policy: बिहार के प्रशासनिक गलियारों से सियासी और सरकारी हलचल की एक बड़ी खबर है।...

Bihar Freezes Transfers CMO Nod Now Mandatory for Postings
बिहार में तबादलों पर सरकार का ब्रेक- फोटो : social Media

Bihar Transfer Policy: बिहार के प्रशासनिक गलियारों से सियासी और सरकारी हलचल की एक बड़ी खबर है। सूबे में सरकारी कर्मचारियों के तबादलों का जो दौर लंबे समय से चल रहा था, उस पर सरकार ने अब पूरी तरह से विराम लगा दिया है। मनचाही पोस्टिंग और रसूख के दम पर मलाईदार विभागों में जाने की ख़्वाहिश रखने वाले अफ़सरों और कर्मियों की उम्मीदों पर फ़िलहाल पानी फिर गया है। अब ऐसे कर्मचारियों  को या तो साल भर का लंबा इंतज़ार करना होगा या फिर सीधे मुख्यमंत्री दफ़्तर की दहलीज पर दस्तक देनी होगी।

सामान्य प्रशासन विभाग के कड़े दिशा-निर्देशों के मुताबिक, अब मुल्क के किसी भी विभाग में आम दिनों की तरह तबादले नहीं किए जा सकेंगे। हालांकि, अगर कोई कर्मचारी या उसका परिवार किसी शगंभीर मर्ज़ से पीड़ित है, तो इंसानी हमदर्दी के तौर पर उसकी अर्ज़ी पर ग़ौर किया जा सकता है।

इस तरह के विशेष मामलों में राहत पाने के लिए राज्य स्तरीय अधिकारियों को सीधे विभागीय सचिव को अपनी गुहार भेजनी होगी। इसके बाद विभागीय स्थापना समिति की सिफ़ारिश और आख़िर में मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) की मुहर के बाद ही तबादले के हुक्मनामे पर दस्तख़त हो सकेंगे।आने वाले दिनों में होने वाले पंचायत चुनावों के मद्देनजर हुकूमत ने साफ कर दिया है कि चुनाव ड्यूटी से जुड़े किसी भी ओहदेदार का तबादला बिना राज्य निर्वाचन आयोग की हरी झंडी के मुमकिन नहीं होगा। इसके अलावा, अगर कोई अफ़सर एक विभाग से दूसरे महकमे में जैसे स्वास्थ्य विभाग से जेल अस्पताल जाना चाहता है, तो उसे दोनों मंत्रालयों से अनापत्ति प्रमाण पत्र  हासिल करना लाज़मी होगा। यानी, दोतरफ़ा रज़ामंदी के बिना फ़ाइल आगे नहीं बढ़ेगी।

इस नए व्यवस्था में पुलिस महकमे को थोड़ी ढील दी गई है, जहां क़ानून-व्यवस्था की ज़रूरतों के मुताबिक कभी भी फेरबदल हो सकता है। वहीं, शिक्षकों के लिए हुकूमत ने एक ख़ास च्वाइस ट्रांसफर पॉलिसी तैयार की है, जिसके तहत महिला और पुरुष शिक्षकों को उनके गृह क्षेत्र के नज़दीकी पंचायतों में प्राथमिकता दी जाएगी। साफ़ है कि अब बिना ठोस वजह और आलाकमान की रज़ा के प्रशासनिक अमले में कोई बड़ा फेरबदल मुमकिन नहीं है।बिहार के प्रशासनिक गलियारों में बड़े पैमाने पर चल रहा तबादलों का सियासी और प्रशासनिक दस्तूर अब पूरी तरह थम गया है। मनचाही जगह पोस्टिंग की आस लगाए बैठे जिन मुलाज़िमों (कर्मचारियों) की हसरत इस सीज़न में अधूरी रह गई है, उनके लिए अब हुकूमत के नए फरमान ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं। आम दफ़्तरी निज़ाम के तहत अब अगले साल ही फेरबदल की बिसात बिछ पाएगी। सामान्य प्रशासन विभाग के कड़े नियमों के मुताबिक, अब किसी भी विभाग में आम तौर पर तबादले नहीं होंगे।

गंभीर अस्वस्थता या बेहद नाजुक विशेष परिस्थिति को छोड़कर अब किसी भी अर्जी पर गौर नहीं किया जाएगा। हालांकि, जिन मुलाज़िमों के परिवार यानी जीवनसाथी या बच्चे किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं, उन्हें इलाज की खातिर राहत मिल सकती है।लेकिन इसके लिए भी नौकरशाही की पेचीदा दफ़्तरी हिदायतों से गुजरना होगा. मुलाज़िमों को जिला स्थापना समिति के हुज़ूर अपनी गुहार लगानी होगी।अफसरों और कर्मियों को सीधे अपने महकमे के मंत्री या सेक्रेटरी  के समक्ष दरख्वास्त पेश करनी होगी। विभागीय कमेटी की सिफारिश के बाद अंतिम मंजूरी के लिए फाइल सूबे के रहनुमा यानी मुख्यमंत्री कार्यालय  भेजी जाएगी, जहां से हरी झंडी मिलने के बाद ही तबादले के आदेश जारी होंगे। सितंबर से नवंबर के दरमियान यदि कोई भी अधिकारी तबादाले की जुगत में है, तो शर्त यह है कि उसका वास्ता आने वाले पंचायत चुनाव की डयूटी से न हो। चुनावी ज़िम्मेदारी से जुड़े अफसरों के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की पेशगी पूर्वानुमति लाज़मी होगी।

इसके अलावा, दो अलग-अलग कैडरों के बीच प्रतिनियुक्ति के लिए दोनों महकमों के दरमियान आपसी रज़ामंदी और अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) को अनिवार्य कर दिया गया है। मिसाल के तौर पर, यदि स्वास्थ्य महकमे का कोई डॉक्टर जेल के हस्पताल में तैनाती चाहता है, तो उसे स्वास्थ्य और कारा  दोनों विभागों से रज़ामंदी लेनी होगी।सरकार ने पुलिस विभाग को इस समय-सीमा की पाबंदी से आज़ाद रखा है, उनकी तबादले की कार्रवाई  हिफाजत की जरूरतों के मुताबिक चलती रहेगी। वहीं, सूबे के शिक्षकों के लिए नई तबादला नीति लागू की गई है, जिसके तहत महिला शिक्षकों को उनके गृह पंचायत के बाहर नजदीकी इलाकों में प्राथमिकता दी जाएगी।