जिन 25 चीनी मिलों को सरकार ने शुरू करने का लिया फैसला, उसमें सासामुसा शामिल नहीं, अब बंद पड़ी मिल को किया जा रहा निलाम, किसानों की समस्या का नहीं हुआ समाधान
बिहार में नई सरकार के गठन के बाद बंद पड़ी चीनी मिलों को लेकर जो उम्मीदें जगी थीं, वे अब कांच की तरह टूटती नजर आ रही हैं। सरकार के अपने ही वादों से यू-टर्न लेने के बाद किसानों में भारी आक्रोश है।
Patna - तीन साल पहले 'समाधान यात्रा' के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिस सासामुसा चीनी मिल को दोबारा शुरू करने और किसानों का पाई-पाई बकाया चुकाने का वादा किया था, आज उसी मिल के अस्तित्व पर अंतिम प्रहार हो चुका है। सरकार की 'पहल' का इंतजार करते-करते किसान थक गए और अब खबर आई है कि 17 फरवरी 2026 को मिल की जमीन नीलाम होने जा रही है। यह न केवल एक उद्योग की मौत है, बल्कि उन हजारों किसानों के भरोसे की हत्या है जिन्होंने मुख्यमंत्री के आश्वासन पर अपना आंदोलन वापस लिया था।
वादे की मियाद खत्म, अब नीलामी का 'अंतिम नोटिस'
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गोपालगंज की समीक्षा बैठक में स्पष्ट कहा था कि सासामुसा मिल चालू होगी और किसानों का बकाया नहीं देने पर मिल जब्त कर भुगतान होगा। लेकिन हकीकत इसके उलट निकली। भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) ने मिल की 44 बीघा 08 कट्ठा 07 धुर भूमि की नीलामी के लिए 66 करोड़ 40 लाख रुपये का आरक्षित मूल्य तय कर दिया है। 17 फरवरी 2026 को होने वाली इस ई-नीलामी ने क्षेत्र के किसानों के बीच हड़कंप मचा दिया है।
46 करोड़ का बकाया और किसानों की 'बदहाली'
सासामुसा चीनी मिल कभी कुचायकोट, पंचदेवरी और कटेया जैसे प्रखंडों की आर्थिक लाइफलाइन थी। साल 2018 के भीषण हादसे के बाद मिल की जो स्थिति बिगड़ी, वह फिर कभी संभल नहीं पाई। आज स्थिति यह है कि किसानों का लगभग 46 करोड़ रुपये बकाया है। नीलामी की प्रक्रिया शुरू होने से किसानों में डर है कि जमीन बिकने के बाद उनकी मेहनत की कमाई पर 'डाका' पड़ जाएगा, क्योंकि सरकार की ओर से बकाया भुगतान की कोई ठोस गारंटी अब तक नहीं दिखी है।
विधायक का आश्वासन और 'सियासी दांव'
बीते दिसंबर में जब किसान मिल गेट पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे थे, तब स्थानीय विधायक अमरेंद्र कुमार पांडे ने मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद भरोसा दिलाया था कि मिल हर हाल में बचेगी। किसानों ने उसी भरोसे पर धरना खत्म किया था। लेकिन अब नीलामी के अंतिम चरण में पहुँचने से यह स्पष्ट हो गया है कि वह आश्वासन केवल आंदोलन शांत करने का एक 'सियासी हथकंडा' था। किसानों के सपनों को सिस्टम की बेरुखी ने नीलाम कर दिया है।
बिहार में चीनी उद्योग का गिरता ग्राफ
आजादी के समय बिहार में 35 चीनी मिलें थीं, जो देश के चीनी उत्पादन में 28% का योगदान देती थीं। आज यह संख्या घटकर महज 11 रह गई है और उत्पादन गिरकर 2.5% पर सिमट गया है। सासामुसा मिल उन 25 बंद मिलों की सूची से भी बाहर है जिन्हें सरकार ने फिर से शुरू करने का फैसला लिया था। यह दर्शाता है कि सरकार के एजेंडे में बिहार के इस गौरवशाली उद्योग को बचाना कभी प्राथमिकता में था ही नहीं।
खत्म हुई उम्मीद, अब आंदोलन की आहट
16 फरवरी तक ईएमडी (अग्रिम राशि) जमा करने की अंतिम तिथि है और 17 को नीलामी। इस प्रक्रिया ने उन हजारों परिवारों को मझधार में छोड़ दिया है जिनकी आजीविका इस मिल से जुड़ी थी। किसानों का कहना है कि सुशासन की सरकार ने उन्हें कॉर्पोरेट के हवाले कर दिया है। निराशा और हताशा की यह लहर अब फिर से एक बड़े जन-आंदोलन की चिंगारी बन सकती है, क्योंकि सासामुसा के किसानों के पास अब खोने के लिए कुछ नहीं बचा है।