MLA vs MLC: MLA और MLC में क्या अंतर है? जानें चुनाव, कार्यकाल, वेतन और अधिकारों से जुड़ी जरूरी बातें

MLA vs MLC: MLA और MLC में क्या अंतर है? जानें विधायक और विधान पार्षद का चुनाव कैसे होता है, उनका कार्यकाल कितना है और सरकार बनाने, धन विधेयक व राज्यसभा चुनाव में उनके क्या अधिकार हैं।

 MLA vs MLC

 MLA vs MLC: बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों के लिए 23 अक्टूबर को मतदान होना है। इन सीटों पर आम जनता सीधे वोट नहीं देती, बल्कि संबंधित निर्वाचन क्षेत्र के तय मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करते हैं। इस बार चार सीटें स्नातक निर्वाचन क्षेत्र और चार सीटें शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की हैं।


ऐसे में यह जानना जरूरी है कि विधायक यानी MLA और विधान पार्षद यानी MLC में क्या अंतर होता है। दोनों कानून बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, लेकिन उनके चुनाव का तरीका, कार्यकाल और अधिकार अलग-अलग हैं।


MLA और MLC किस सदन के सदस्य होते हैं?


MLA का पूरा नाम Member of Legislative Assembly है। हिंदी में इन्हें विधायक कहा जाता है। विधायक राज्य की विधानसभा का सदस्य होता है। विधानसभा को राज्य का निचला सदन कहा जाता है। वहीं, MLC का पूरा नाम Member of Legislative Council है। हिंदी में इन्हें विधान पार्षद कहते हैं। ये राज्य की विधान परिषद के सदस्य होते हैं, जिसे ऊपरी सदन कहा जाता है। हर राज्य में विधान परिषद नहीं होती। बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी विधान परिषद है।


विधायक और विधान पार्षद का चुनाव कैसे होता है?


विधायक का चुनाव सीधे जनता करती है। 18 साल या उससे अधिक उम्र का भारतीय नागरिक, जिसका नाम संबंधित मतदाता सूची में है, विधानसभा चुनाव में वोट दे सकता है। विधायक का चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम उम्र 25 साल होनी चाहिए। विधान पार्षदों के चुनाव का तरीका अलग है। विधान परिषद की अलग-अलग सीटों के लिए स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि, स्नातक मतदाता, शिक्षक मतदाता और विधायक मतदान करते हैं। इसके अलावा, कुछ सदस्यों को राज्यपाल नामित करते हैं।


संविधान के अनुच्छेद 171 के अनुसार, विधान परिषद के लगभग एक-तिहाई सदस्य विधायकों द्वारा और लगभग एक-तिहाई स्थानीय निकायों के मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं। करीब एक-बारहवां हिस्सा स्नातक मतदाता और एक-बारहवां हिस्सा शिक्षक मतदाता चुनते हैं। बाकी लगभग एक-छठे सदस्य राज्यपाल नामित करते हैं।विधान पार्षद का चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम उम्र 30 साल होनी चाहिए।


बिहार में 23 अक्टूबर को कौन वोट देगा?


बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए इस बार स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव हो रहा है। इसलिए इन सीटों पर सभी आम मतदाता वोट नहीं डालेंगे। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में वही पात्र मतदाता वोट दे सकते हैं, जो संबंधित मतदाता सूची में पंजीकृत हैं और निर्धारित शर्तें पूरी करते हैं। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भी पात्र और पंजीकृत शिक्षक मतदाता मतदान करते हैं। इन आठ सीटों में पटना, दरभंगा, तिरहुत और कोसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। वहीं, पटना, दरभंगा, तिरहुत और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में भी मतदान होगा। 


विधानसभा भंग हो सकती है, विधान परिषद नहीं


विधानसभा का सामान्य कार्यकाल पांच साल होता है। हालांकि, इसे पांच साल पूरे होने से पहले भी भंग किया जा सकता है। इसके बाद नई विधानसभा के गठन के लिए चुनाव कराया जाता है। विधान परिषद एक स्थायी सदन है। इसे भंग नहीं किया जाता। इसके करीब एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते हैं और उनकी जगह नए सदस्य चुने जाते हैं या नियमों के अनुसार नामित किए जाते हैं। विधान पार्षद का सामान्य कार्यकाल छह साल होता है। हालांकि, किसी खाली सीट पर उपचुनाव से चुने गए सदस्य का कार्यकाल उस सीट के बचे हुए समय के अनुसार हो सकता है।


विधायक और विधान पार्षद के वेतन में क्या अंतर है?


विधायक और विधान पार्षद के वेतन, भत्ते और दूसरी सुविधाएं राज्य के कानूनों और लागू नियमों के अनुसार तय होती हैं। इसलिए दोनों का वेतन बिल्कुल बराबर है या अलग, यह बताने के लिए बिहार में लागू मौजूदा वेतन और भत्ता नियमों की तुलना जरूरी है। दोनों सदनों के सदस्यों के अधिकार भी एक जैसे नहीं हैं। विधानसभा को राज्य के वित्तीय मामलों और सरकार की जवाबदेही के मामले में ज्यादा अधिकार मिले हैं। विधान परिषद कानूनों पर चर्चा कर सकती है और विधेयकों में बदलाव के सुझाव दे सकती है, लेकिन कई मामलों में उसके अधिकार सीमित हैं।


धन विधेयक पर किस सदन का फैसला अंतिम होता है?


राज्य का धन विधेयक केवल विधानसभा में पेश किया जा सकता है। विधान परिषद इसे खारिज नहीं कर सकती। वह इस पर सुझाव देकर अधिकतम 14 दिनों के भीतर विधानसभा को वापस भेज सकती है। विधानसभा इन सुझावों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। अगर विधान परिषद 14 दिनों के भीतर धन विधेयक वापस नहीं भेजती, तो उसे विधानसभा द्वारा पारित रूप में दोनों सदनों से पारित माना जाता है।


सरकार बनाने और गिराने में किसकी भूमिका होती है?


राज्य की मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है। विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद को पद छोड़ना पड़ सकता है। विधान परिषद में अविश्वास प्रस्ताव पारित करके सरकार को हटाने का अधिकार नहीं है। हालांकि, विधान पार्षद सवाल पूछ सकते हैं, बहस में हिस्सा ले सकते हैं और सरकार की नीतियों तथा कामकाज पर चर्चा कर सकते हैं।


राष्ट्रपति और राज्यसभा चुनाव में कौन वोट देता है?


राष्ट्रपति चुनाव में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य और राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक मतदान करते हैं। विधान परिषद के सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में वोट नहीं डालते। राज्यसभा चुनाव में भी राज्यों के निर्वाचित विधायक मतदान करते हैं। विधान पार्षदों को राज्यसभा के सदस्यों के चुनाव में वोट देने का अधिकार नहीं है। इस तरह MLA और MLC दोनों राज्य की राजनीति और कानून बनाने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन उनके चुनाव का तरीका, कार्यकाल और अधिकार अलग-अलग हैं।