बिहार पंचायत चुनाव टला, परिसीमन से बदलेगा पूरा सियासी नक्शा, 12,500 पंचायतें, 1.76 लाख वार्ड और सरकार पर 550 करोड़ का नया बोझ
Bihar Panchayat Elections: बिहार की पंचायत राजनीति में बड़ा बदलाव तय माना जा रहा है।....
Bihar Panchayat Elections: बिहार की पंचायत राजनीति में बड़ा बदलाव तय माना जा रहा है। राज्य में अक्टूबर-नवंबर 2026 में प्रस्तावित पंचायत चुनाव अब जुलाई-अगस्त 2027 में होने की संभावना है। इसकी सबसे बड़ी वजह पंचायती राज संस्थाओं का नए सिरे से परिसीमन है, जिसके बाद पंचायतों की सीमाएं बदलेंगी, नए वार्ड बनेंगे और जनप्रतिनिधियों की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी होगी। इस फैसले से बिहार की ग्रामीण सियासत का पूरा समीकरण बदलने वाला है।
सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद क्षेत्रों का पुनर्गठन करेगी। इसका मकसद आबादी के अनुरूप संतुलित प्रतिनिधित्व देना है। अभी राज्य में 8,041 ग्राम पंचायतें हैं, लेकिन परिसीमन के बाद इनकी संख्या बढ़कर करीब 12,500 हो जाएगी। यानी मुखिया और सरपंच के पदों में लगभग 55 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी।
यही नहीं, वर्तमान में 1,09,310 वार्ड हैं, जिनकी संख्या बढ़कर लगभग 1.76 लाख होने का अनुमान है। पंचायत समिति सदस्यों की संख्या 11,070 से बढ़कर 17,600 और जिला परिषद सदस्यों की संख्या 1,160 से बढ़कर 1,760 हो जाएगी। इससे गांव की सियासत में नए चेहरे उभरेंगे और राजनीतिक दावेदारों की तादाद भी बढ़ेगी। हालांकि इस बदलाव की बड़ी कीमत भी सरकार को चुकानी पड़ेगी। जनप्रतिनिधियों के मानदेय पर होने वाला सालाना खर्च 330 करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 550 करोड़ रुपये पहुंच सकता है। यह राशि राज्य वित्त आयोग के अनुदान से दी जाती है, इसलिए सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ना तय माना जा रहा है।
परिसीमन का असर सिर्फ चुनावी कैलेंडर तक सीमित नहीं रहेगा। चुनाव में देरी होने से केंद्रीय वित्त आयोग से मिलने वाली अनुदान राशि भी एक साल देर से मिलने की आशंका है। इसका सीधा असर पंचायतों में चलने वाले विकास कार्यों और नई योजनाओं पर पड़ सकता है।
पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश ने साफ किया है कि राज्य मंत्रिमंडल ने परिसीमन कराने का फैसला लिया है। इसके साथ ही आरक्षण रोस्टर में भी बदलाव होगा, क्योंकि इसे हर दस वर्ष में संशोधित करना अनिवार्य है। अब निर्वाचन आयोग परिसीमन और नए आरक्षण रोस्टर को अंतिम रूप देगा। इसके बाद ही चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। स्पष्ट है कि बिहार का अगला पंचायत चुनाव सिर्फ जनप्रतिनिधियों के चयन का नहीं, बल्कि ग्रामीण सत्ता, राजनीतिक समीकरण और स्थानीय नेतृत्व के नए दौर की शुरुआत का चुनाव साबित होगा।