Bihar Police Custody Death: बिहार में मानवाधिकारों की खौफनाक तस्वीर! यूपी-दिल्ली के बाद तीसरे नंबर पर सूबा,पढ़िए खाकी और जेलों का काला सच

Bihar Police Custody Death: बिहार में कानून-व्यवस्था और मानवाधिकारों की हिफाजत को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।..

Bihar Ranks Third in Human Rights Complaints NHRC Data Revea
बिहार में खाकी और जेलों का काला सच- फोटो : reporter

Bihar Police Custody Death: बिहार की राजधानी से लेकर थानों और जेलों तक का अंधकारमय सच एक बार फिर बेनकाब हो चुका है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के ताजा आंकड़ों ने सूबे की कानून-व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में बिहार ने देश में तीसरा स्थान हासिल किया है, जो प्रशासनिक विफलता और बेदर्द व्यवस्था की एक खौफनाक दास्तान बयां करता है।खाकी के साये में दम तोड़ती इंसानियतवर्ष 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के गठन के बाद से अब तक बिहार से कुल 1,22,954 शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं।

राजधानी पटना में भी हालात चिंताजनक बताए गए हैं। यहां अब तक 12,792 शिकायतें दर्ज होने की बात सामने आई है। हाल ही में पटना के ज्ञान भवन में आयोजित विशेष सुनवाई के दौरान आयोग ने पीड़ित परिवारों को राहत देने के लिए 1.50 करोड़ रुपये के मुआवजे का आदेश जारी किया। यह कार्रवाई उन परिवारों के लिए अहम है, जो कथित मानवाधिकार उल्लंघन के बाद इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं।

आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में पुलिस के खिलाफ 35,902 शिकायतें दर्ज की गई हैं। यह संख्या पुलिस के कामकाज, हिरासत में लोगों के साथ व्यवहार और जवाबदेही की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। शिकायतों की संख्या अपने आप में हर आरोप को साबित नहीं करती, लेकिन मामलों की गंभीरता निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई की जरूरत जरूर रेखांकित करती है।

इसी तरह, पुलिस हिरासत में 238 आरोपियों की मौत और जेलों के भीतर 4,311 कैदियों की मौत का आंकड़ा भी चिंता बढ़ाता है। शेल्टर होम और सुधार गृहों में 19 लोगों की मौत का जिक्र भी किया गया है। इसके अलावा, महिलओं के उत्पीड़न और दुष्कर्म से संबंधित 8,899 शिकायतें तथा बच्चों के खिलाफ अपराध के 1,891 मामले दर्ज होने की बात सामने आई है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन ने पुलिस लॉकअप और जेलों में होने वाली मौतों को मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन से जुड़ा मामला बताया। उन्होंने नौबतपुर के सचिन की मौत का भी जिक्र किया, जिनकी तीन साल पहले बेउर जेल में कथित तौर पर समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण जान चली गई थी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, आयोग ने उनके आश्रितों को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।

आयोग ने मामलों के निपटारे में पहले के मुकाबले तेजी आने की बात भी कही है। हालांकि, शिकायतों का निपटारा करना और पीड़ितों को वास्तविक इंसाफ दिलाना दो अलग-अलग पहलू हैं। जरूरी है कि हिरासत में होने वाली मौतों की निष्पक्ष जांच हो, दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई की जाए और पीड़ित परिवारों को समय पर मुआवजा मिले।बिहार में मानवाधिकारों की हिफाजत के लिए पुलिस सुधार, जेलों में बेहतर चिकित्सा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत करना बेहद जरूरी है। आखिरकार, कानून का इकबाल तभी कायम होगा, जब आम नागरिक की जान, इज्जत और बुनियादी अधिकार सरकारी तंत्र की निगरानी में भी सुरक्षित रहेंगे।

हीरेश कुमार