राशन कार्ड की राह में जाति प्रमाणपत्र का जाल, ससुराल- मायके के चक्कर में फंसीं विवाहित महिलाएं, इस कारण हजारों आवेदन अधर में

Bihar Ration Card: बिहार में विशेष राशन कार्ड अभियान के बीच एक बड़ी प्रशासनिक पेचीदगी सामने आई है। ...

Caste Certificate Rule Delays Ration Cards for Married Women
ससुराल- मायके के चक्कर में फंसीं विवाहित महिलाएं,- फोटो : social Media

Bihar Ration Card: बिहार में विशेष राशन कार्ड अभियान के बीच एक बड़ी प्रशासनिक पेचीदगी सामने आई है। सरकार जहां पात्र परिवारों तक जल्द से जल्द राशन कार्ड पहुंचाने के लिए अभियान चला रही है, वहीं जातीय प्रमाणपत्र की अनिवार्यता विवाहित महिलाओं के लिए सबसे बड़ा रोड़ा बन गई है। हालात ऐसे हैं कि हजारों आवेदन सिर्फ इस वजह से फाइलों में अटक गए हैं क्योंकि महिलाओं को अपना जाति प्रमाणपत्र ससुराल नहीं, बल्कि मायके से बनवाना पड़ रहा है।

आय और आवासीय प्रमाणपत्र स्थानीय स्तर पर आसानी से बन रहे हैं, लेकिन जातीय प्रमाणपत्र के लिए महिलाओं को बार-बार दूसरे प्रखंड, दूसरे गांव या दूसरे जिले तक दौड़ लगानी पड़ रही है। इस प्रशासनिक उलझन ने गरीब और मजदूर परिवारों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। रोज कमाने-खाने वाले परिवारों के लिए बार-बार सफर करना जेब पर भी भारी पड़ रहा है और मजदूरी का नुकसान भी अलग से हो रहा है।

सारण जिले में स्थिति सबसे ज्यादा चर्चा में है। यहां 13 अगस्त तक 49,455 नए राशन कार्ड बनाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन 2 अगस्त तक ही 57,549 आवेदन प्राप्त हो चुके हैं। इनमें 52,007 आवेदनों का सत्यापन पूरा हो चुका है, जबकि 5,602 आवेदन अब भी लंबित हैं। अधिकारियों के अनुसार, इनमें से करीब 5,000 आवेदन केवल विवाहित महिलाओं के जातीय प्रमाणपत्र के अभाव में अटके हुए हैं।

अभियान के दौरान आवेदन की रफ्तार भी तेज रही। 31 जुलाई को एक ही दिन में 6,211 आवेदन, 1 अगस्त को 2,318 और 2 अगस्त को 726 आवेदन प्राप्त हुए। लेकिन दस्तावेजों की कमी ने पूरी प्रक्रिया की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।

अब जिला प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती अधूरे दस्तावेजों को समय रहते पूरा कराना और पात्र परिवारों को तय समय सीमा के भीतर राशन कार्ड उपलब्ध कराना है। यदि जातीय प्रमाणपत्र की प्रक्रिया में व्यावहारिक समाधान नहीं निकाला गया, तो हजारों जरूरतमंद परिवार सरकारी खाद्यान्न योजना के लाभ से वंचित रह सकते हैं। ऐसे में यह मुद्दा केवल दस्तावेजी औपचारिकता का नहीं, बल्कि गरीब परिवारों के अधिकार और सरकारी योजनाओं की प्रभावी पहुंच का भी अहम सवाल बन गया है।