Bihar Politics:सीएम का बदला एजेंडा, विशेष राज्य की मांग से पलटे नीतीश कुमार, पीएम मोदी से क्या-क्या मांग रहा बिहार? बजट से पहले बदली रणनीति या मजबूरी की राजनीति,पढ़िए
Bihar Politics:सालों तक बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने को अपनी सियासी पहचान बनाए रखने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक ऐसा यू-टर्न लिया है, जिसने सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।...
Bihar Politics:सालों तक बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने को अपनी सियासी पहचान बनाए रखने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक ऐसा यू-टर्न लिया है, जिसने सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। 1 फरवरी को पेश होने वाले आम बजट से ठीक पहले बिहार सरकार ने केंद्र को जो मांगों का ज्ञापन सौंपा है, उसमें न तो विशेष राज्य का दर्जा है और न ही स्पेशल पैकेज का पुराना शोर। इसकी जगह अब ज्यादा कर्ज, ज्यादा उद्योग और बाढ़ राहत पैकेज को प्राथमिकता दी गई है।
यह बदलाव महज कागजी नहीं, बल्कि नीतीश की सियासत में बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। सवाल उठ रहा हैक्या यह केंद्र से टकराव की राजनीति छोड़कर समझौते की राह पकड़ने का संकेत है, या फिर बदलते राजनीतिक समीकरणों की मजबूरी?
विशेष राज्य की मांग: एजेंडे से आउट
नीतीश कुमार 2005 में सत्ता संभालने के बाद से ही बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के सबसे बड़े पैरोकार रहे हैं। 2010 से 2013 तक रैलियां, 2017 में केंद्र को चिट्ठी, 2021 में नीति आयोग के सामने गुहार और 2023 में कैबिनेट प्रस्ताव हर मंच पर यह मांग दोहराई जाती रही। 2024 के बाद NDA बैठकों में भी यह मुद्दा उठता रहा।
लेकिन इस बार बजट-पूर्व ज्ञापन में यह मांग पूरी तरह गायब है। सियासी जानकारों का मानना है कि केंद्र से लगातार नकारात्मक जवाब मिलने और पिछले साल मिले ₹59 हजार करोड़ के स्पेशल पैकेज के बाद नीतीश सरकार ने रणनीति बदल ली है।
रोजगार और उद्योग: नई सियासी पिच
अब नीतीश सरकार का पूरा फोकस है—एक करोड़ नौकरी और रोजगार। इसी एजेंडे के तहत केंद्र से राज्य में नई इंडस्ट्री लगाने, अलग से औद्योगिक पैकेज देने और स्किल्ड लेबर का लाभ उठाने की मांग की गई है। बिहार सरकार का तर्क है कि जल संसाधन और श्रम शक्ति की भरपूर उपलब्धता के बावजूद निवेश की कमी है, जिसे केंद्र के सहयोग से दूर किया जा सकता है।
कृषि क्षेत्र को भी रोजगार का बड़ा हथियार बनाने की तैयारी है। ज्ञापन में AI, ड्रोन और ब्लॉकचेन जैसी आधुनिक तकनीकों को खेती से जोड़ने की मांग रखी गई है, ताकि एग्री-इंडस्ट्री को रफ्तार मिले।
बाढ़ और विकास की दोहरी चुनौती
उत्तरी बिहार में कोसी, गंडक और बागमती हर साल तबाही मचाती हैं। सरकार ने एक बार फिर बाढ़ राहत के लिए स्पेशल पैकेज मांगा है। इसमें सैटेलाइट पूर्वानुमान, GIS मैपिंग, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और नदी जोड़ो परियोजना को प्राथमिकता देने की अपील शामिल है।
कर्ज की राजनीति और चुनावी दबाव
सबसे विवादास्पद मांग है कर्ज की सीमा बढ़ाने की। बिहार सरकार चाहती है कि 3% की मौजूदा सीमा को 5% किया जाए। जबकि सच्चाई यह है कि राज्य का करीब 75% राजस्व केंद्र पर निर्भर है और 2024-25 के अंत तक बिहार का कर्ज ₹3.48 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है, जो GDP का लगभग 39% है। सियासी हलकों में चर्चा है कि यह मांग चुनावी वादों को निभाने के लिए संसाधन जुटाने की कोशिश है।
पिछले बजट के वादे: जमीन पर कितने उतरे?
मखाना बोर्ड, फूड प्रोसेसिंग संस्थान और पूर्वोदय योजना जैसी घोषणाएं अभी भी फाइलों में उलझी हैं। हालांकि एयर कनेक्टिविटी पर काम दिख रहा है पटना एयरपोर्ट का विस्तार, पूर्णिया एयरपोर्ट की शुरुआत और कई ग्रीनफील्ड हवाई अड्डों की प्रक्रिया जारी है।
बहरहाल नीतीश कुमार का यह यू-टर्न बिहार की राजनीति में नए संकेत दे रहा है। विशेष राज्य की लड़ाई से पीछे हटकर उद्योग, रोजगार और राहत पर दांव यह रणनीति बिहार को कितना फायदा दिलाएगी, इसका फैसला अब केंद्र के बजट और आने वाले सियासी घटनाक्रम करेंगे।