News4Nation के वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन शर्मा को मातृशोक, 80 साल की उम्र में माँ कृष्णा देवी का हुआ देहावसान

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PATNA : माँ अब नहीं रही....मकर संक्रांति के दिन दोपहर में कार्यालय में काम कर रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन शर्मा के मुंह से अचानक यह शब्द निकला। जिसके बाद सबके चेहरे पर न्यूजरूम में अचानक सन्नाटा छा गया। संक्रांति की खुशियाँ देखते ही देखते उदासी में बदल गयी। सभी ने प्रियदर्शन को सांत्वना देने की कोशिश की। लेकिन भरी आँखों के साथ तेज क़दमों से प्रियदर्शन शर्मा ने अपने सभी सामान समेटे और अपने गाँव मोकामा के लिए निकल गए। यहाँ से ही प्रियदर्शन रोज सुबह ट्रेन पकड़कर आते है और अपनी शिफ्ट पूरी कर शाम में घर लौट जाते हैं। रोज अपनी माँ की कुछ न कुछ बातें हम सभी को बताया करते थे। जिससे सुनी सुनाई बातों से ही हम सब भी माँ से अच्छी तरह परिचित हो चुके थे।

माँ के जाने की भरपाई कोई नहीं कर सकता है। जिनकी गोद में हम बड़े होते हैं। उनसे मिले संस्कारों से हम सब देश और समाज में अपनी अहमियत रख पाते हैं। प्रियदर्शन शर्मा की दिवंगत माँ कृष्णा देवी ने इसी तरह अपने सभी कर्तव्यों का बखूबी पालन किया। अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए उन्होंने 80 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 

अपने पीछे वे दो पुत्र और तीन पुत्रियाँ छोड़ गयी हैं। पुत्रों में बड़े प्रियदर्शन शर्मा और छोटे प्रेमदर्शन शर्मा हैं। जबकि पुत्रियों में कविता, संगीता और सभ्यता हैं। पति बालमुकुन्द शर्मा के वर्षों पहले निधन के बाद भी कृष्णा देवी ने अपने पारिवारिक धर्म को बखूबी निभाया। सभी बेटे बेटियों को पढ़ा-लिखाकर योग्य नागरिक बनाया। उनकी शादियाँ की। जिसके बाद इन सभी का भरा-पूरा परिवार है। 

दिवंगत कृष्णा देवी का जन्म पटना के पंडारक में हुआ था, जहाँ से उन्होंने संस्कारों और सेवा की शिक्षा ली। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन अपने परिवार को सींचने और सामाजिक उत्तरदायित्वों को निभाने में व्यतीत किया। उनकी पहचान एक ऐसी महिला के रूप में थी। परिजनों के अनुसार, कृष्णा देवी ताउम्र अपनी मर्यादाओं और पारिवारिक कर्तव्यों के प्रति सजग रहीं। उनके व्यक्तित्व में सादगी और ममता का अनूठा संगम था। उनके निधन से परिवार के सदस्यों का रो-रोकर बुरा हाल है और घर में एक ऐसा सूनापन छा गया है, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं होगी। परिवार के सदस्यों का कहना है कि वे उनके लिए केवल एक अभिभावक ही नहीं, बल्कि प्रेरणा की स्रोत भी थीं।