महादलित बस्ती से पिंक बस तक : बिहार की 6 बेटियों ने थामी स्टेयरिंग, बदली पहचान
भारत में कई ऐसे काम हैं, जिन्हें लंबे समय से पुरुषों का पेशा माना जाता रहा है। इनमें से एक है पब्लिक बस चलाना। जब भी हम बस ड्राइवर की कल्पना करते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में पुरुष की तस्वीर आती है। हालांकि, अब यह सोच धीरे-धीरे बदल रही है...
Patna : बिहार में सामाजिक और पारिवारिक रूढ़ियों को दरकिनार करते हुए महादलित मुसहर समुदाय की छह युवतियों ने एक मिसाल कायम की है। राज्य सरकार की पिंक बस सेवा में ड्राइवर के रूप में कमान संभालकर इन बेटियों ने न केवल अपनी पहचान बदली है, बल्कि समाज की सोच को भी एक नया आयाम दिया है।
महिला सशक्तिकरण और पिंक बस सेवा की शुरुआत
महिलाओं को सुरक्षित और बेहतर परिवहन व्यवस्था के उद्देश्य से मई 2025 में राज्य में पिंक बस सेवा की शुरुआत की गई थी। सरकार ने फैसला किया था कि इन बसों में ड्राइवर से लेकर कंडक्टर तक पूरा स्टाफ महिलाएं ही होंगी। शुरुआत में परिवहन विभाग को कंडक्टर के रूप में काम करने के लिए महिलाएं तो मिल गईं, लेकिन महिला बस ड्राइवरों की कमी चुनौती बनी हुई थी। इस कमी को दूर करने के लिए औरंगाबाद के IDTR संस्थान में इन युवतियों को विशेष ड्राइविंग ट्रेनिंग दी गई, जिसके बाद पटना में BSRTC कार्यालय में इनकी सफलता की गूंज सुनाई दी।
गणतंत्र दिवस पर ऐतिहासिक प्रदर्शन और झांकी का प्रथम स्थान
संघर्षों से भरा यह सफर तब और ऐतिहासिक हो गया जब 26 जनवरी 2026 को पटना के गांधी मैदान में गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान इन 6 महिला ड्राइवरों ने पिंक बस चलाकर सबको चौंका दिया। नारी सशक्तिकरण पर आधारित इस शानदार झांकी को समारोह में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ था।
समाज के तानों को पीछे छोड़ बनीं आत्मनिर्भर
परिजनों और समाज के तानों को सहन करते हुए रागिनी कुमारी, गायत्री कुमारी, आरती कुमारी, सरस्वती कुमारी, बेबी कुमारी और अनीता कुमारी जैसी युवतियों ने साबित कर दिया कि मेहनत और योग्यता से हर मुकाम हासिल किया जा सकता है। बस का स्टेयरिंग थामने वाली इन बेटियों के लिए यह केवल रोजगार नहीं, बल्कि सम्मान, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की एक नई उड़ान है।
पिंक बस चालक 21 वर्षीय रागिनी कुमारी बताती हैं कि “लोग घरवालों को आकर कहते थे, बताओ शादी की उमर हो गई है और इसको ड्राइविंग सीखने भेज दिए हैं। अब जब मैं बस का स्टेयरिंग पकड़ती हूं, तो मुझे आत्मविश्वास मिलता है और मैं खुद को आत्मनिर्भर महसूस करती हूं। हर बार बस स्टार्ट करते समय संघर्ष से भरा अपना पूरा सफर आंखों के सामने आ जाता है।”
वहीं गायत्री कुमारी बताती हैं कि गाड़ी चलाने का प्रशिक्षण लेने के दौरान लोगों ने काफी ताने मारे थे कि ये कुछ नहीं कर पाएगी। मगर अब पिंक बस का संचालन करने पर इन्हें जवाब मिल जाएगा। घर की कुछ जिम्मेदारियां भी हैं, जो पैसे मिलने पर पूरी कर सकुंगी और अपनी पढ़ाई भी करूंगी।”
सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
बिहार की सड़कों पर दौड़ती इन पिंक बसों की कमान अब महिलाओं के हाथों में है, जो यह संदेश देती हैं कि कोई भी पेशा किसी एक लिंग तक सीमित नहीं है। यह पहल राज्य की उन तमाम महिलाओं और युवतियों के लिए एक मजबूत प्रेरणा बन चुकी है जो पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाना चाहती हैं।