Bihar News : निचली अदालत के यांत्रिक संज्ञान पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख, फर्जी अपहरण मामले में निर्दोषों के खिलाफ समन आदेश किया रद्द

Bihar News : बिना ठोस सबूतों के केस दर्ज करने और निचली अदालतों द्वारा बिना जांचे-परखे आंख मूंदकर संज्ञान लेने की प्रवृत्ति पर पटना हाईकोर्ट ने कड़ा प्रहार किया है।

Bihar News : निचली अदालत के यांत्रिक संज्ञान पर हाईकोर्ट का
पटना हाईकोर्ट का संज्ञान - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : निचली अदालत के यांत्रिक संज्ञान पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। फर्जी अपहरण कांड में निर्दोषों को घसीटने पर पटना हाईकोर्ट ने समन आदेश रद्द किया। बिना ठोस सबूतों के केस दर्ज करने और निचली अदालतों द्वारा आंख मूंदकर संज्ञान लेने के खेल पर पटना हाईकोर्ट ने कड़ा प्रहार किया है। पीरो थाना कांड  (भोजपुर, आरा) से जुड़े एक चर्चित अपहरण मामले में सुनवाई करते हुए जस्टिस चंद्र शेखर झा की एकल पीठ ने आरा के एसीजेएम- 1 की अदालत द्वारा पारित समन आदेश को सिरे से खारिज और रद्द कर दिया।

ये मामला 15 वर्षीय नाबालिग लड़की के कथित किडनैपिंग से जुड़ा था, जिसमें मुख्य आरोपी अमित कुमार के माता-पिता और और मामा को घसीट लिया गया था। पुलिस जांच और क्लोजर रिपोर्ट में इन परिजनों की कोई संलिप्तता नहीं पाई गई थी।  इसके बावजूद, निचली अदालत ने पुलिस की फाइनल रिपोर्ट को नजरअंदाज करते हुए धारा 366(ए) आईपीसी के तहत परिजनों के खिलाफ केस चला दिया।धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज अपने ही बयान में लड़की ने खुद किसी भी तरह के अपहरण या परिजनों की भूमिका से साफ इनकार कर दिया था। 

कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब पीड़िता खुद अपहरण की बात नकार रही है, तो अदालती ट्रायल किस बुनियाद पर जारी रखा जा सकता था? हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि मजिस्ट्रेट को पुलिस रिपोर्ट से असहमत होने का अधिकार है, लेकिन ठोस सबूतों और तथ्यों की अनदेखी कर केवल मनगढ़ंत दावों पर संज्ञान लेना कानून का दुरुपयोग है।हाईकोर्ट ने कहा कि जिस मामले का कोई ठोस तथ्यात्मक आधार ही न हो, उसमें परिजनों को आपराधिक मुकदमे की कठिन प्रक्रिया से गुजारना सरासर अन्याय और अदालत के समय की बर्बादी है।

हाईकोर्ट ने धारा 482 सीआरपीसी के तहत अपनी अंतरनिहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए 18 दिसंबर, 2018 के निचली अदालत के संज्ञान आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया। अदालत के इस कड़े रुख ने स्पष्ट संदेश दिया है कि बिना जांचे-परखे किसी भी बेगुनाह को मुकदमे की आग में नहीं झोंका जा सकता।