IGIMS पेपर लीक कांड, परीक्षा के इर्द-गिर्द साज़िश का जाल, डीन ऑफिस से लेकर निदेशक तक सवालों के घेरे में,रिपोर्ट पर पर्दा क्यों, किसके लिए खामोशी?

एमबीबीएस और पीजी फाइनल ईयर परीक्षा को लेकर बनी कमेटी का रिपोर्ट आने के बाद सवाल है IGIMS आखिर किसे बचाने में लगा है? इस पूरे खेल में कौन-कौन शामिल था, और सच कब सामने आएगायह अब भी रहस्य बना हुआ है।

IGIMS Paper Leak Row Silence Over Report Sparks Conspiracy
IGIMS पेपर लीक कांड की रिपोर्ट पर पर्दा क्यों? - फोटो : reporter

IGIMS paper leak: पटना के नामी मेडिकल संस्थान इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में एमबीबीएस और पीजी फाइनल ईयर परीक्षा को लेकर उठे कथित पेपर लीक और धांधली के इल्ज़ाम अब सिर्फ एक शैक्षणिक विवाद नहीं रहे, बल्कि यह मामला धीरे-धीरे एक हाई-वोल्टेज सियासी और सिस्टम की साख पर सवाल खड़ा करने वाला संगीन प्रकरण बन चुका है। शिक्षा की दीवारों  की रूह कंपा देने वाले इन आरोपों ने पूरे मेडिकल सिस्टम को कटघरे में ला खड़ा किया है। जांच कमेटी ने रिपोर्ट निदेशक को सौंप दिया है।लेकिन संस्थान ने इसे सार्वजनिक नहीं किया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि IGIMS आखिर किसे बचाने में लगा है? इस पूरे खेल में कौन-कौन शामिल था, और सच कब सामने आएगा। यह अब भी रहस्य बना हुआ है।इधर, संबंधित कर्मचारियों और छात्रों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अब तक रिपोर्ट को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? क्या किसी खास चेहरे को बचाने की कोशिश हो रही है? क्या यह पूरा खेल पर्दे के पीछे से चल रही किसी गहरी साज़िश का हिस्सा है? कथित तौर पर घोटाले में डॉ ललीत मोहन की क्या भूमिका है?

 2nd Professional MBBS Exam 2023(H) को  रद्द कर दिया गया है। परीक्षा प्रक्रिया में सेंधमारी, कागज़ात की गोपनीयता भंग होने और चयनित छात्रों को कथित तौर पर लाभ पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं। यह वही परीक्षा है जिसे मेडिकल शिक्षा की रीढ़ माना जाता है।मामले की तह में जाने के लिए शैक्षणिक संकाय के अध्यक्ष डॉ. ओम कुमार की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय जांच कमेटी गठित की गई थी, जिसने अपनी रिपोर्ट निदेशक को सौंप दी है। रिपोर्ट के बाद संस्थान में प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। परीक्षा अनुभाग में बदलाव करते हुए तीन फैकल्टी सदस्यों को Sub-Dean (Exams) का अतिरिक्त चार्ज दिया गया है, जिससे यह साफ झलकता है कि अंदरखाने कुछ बड़ा गड़बड़झाला हुआ है।

बता दें 11 मार्च 2026 को एक गुमनाम ई-मेल ने इस पूरे मामले की चिंगारी भड़काई थी, जिसमें डीन (परीक्षा) कार्यालय के एक कर्मचारी पर पैसे लेकर प्रश्नपत्र उपलब्ध कराने और उत्तर पुस्तिकाओं में हेरफेर के गंभीर आरोप लगाए गए। इसके बाद 17 मार्च को हाई-लेवल मीटिंग हुई, लेकिन ठोस कार्रवाई न होने से हालात और संदिग्ध हो गए। सियासी हलकों में उस वक्त सनसनी फैल गई जब तत्कालीन डीन (परीक्षा) ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद प्रशासनिक फेरबदल हुआ और नए अफसरों को जिम्मेदारी सौंपी गई। लेकिन 7 अप्रैल की अहम बैठक में निदेशक की गैरमौजूदगी ने शक के धुंधलके को और गहरा कर दिया।

छात्र संगठनों और अभिभावकों का साफ कहना है कि यह मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि एक संगठित सिस्टम-लेवल नेटवर्क का संकेत देता है, जहां सेटिंग-गेटिंग और पैसे का खेल शिक्षा  की पवित्रता को दागदार कर रहा है। बता दें संस्थान के निदेशक स्वयं भी एक अन्य मामले में जांच के दायरे में बताए जा रहे हैं, जिससे पूरे प्रकरण पर भरोसे की जमीन और भी कमजोर हो गई है। अब सवाल यही हैक्या सच सामने आएगा या यह मामला भी फाइलों के ढेर में दफ्न हो जाएगा?पूरा मामला अब एक ऐसे मोड़ पर है जहां हर मोड़ पर नया राज़, हर दस्तावेज़ के पीछे नया सवाल और हर चुप्पी के पीछे एक गहरी साज़िश की बू महसूस की जा रही है।सवाल अब सिर्फ परीक्षा रद्द होने का नहीं, बल्कि सिस्टम की साख और नीयत पर है। आखिर जांच कमेटी की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? क्या किसी बड़े चेहरे को बचाने की कोशिश हो रही है या फिर अंदरखाने कोई सिस्टमेटिक साज़िश को दबाया जा रहा है? रिपोर्ट में क्या ऐसा राज़ है जिसे सामने लाने से परहेज़ किया जा रहा है? छात्रों के भविष्य के साथ कथित खिलवाड़ के बावजूद अब तक केस दर्ज न होना कई सवाल खड़े करता है। परीक्षा स्थगित होना और डीन कार्यालय के कर्मचारियों का ट्रांसफर होना अपने आप में धांधली की ओर इशारा करता है। फिर भी कार्रवाई अधूरी क्यों है?