Bihar Politics: जदयू में वारिस की एंट्री की कहानी, 8 मार्च को राजनीति में कदम रखेंगे निशांत कुमार, क्या शुरू होगा नीतीश युग का नया अध्याय?

Bihar Politics: बिहार की सियासत में अब एक बड़ा सियासी मोड़ आने जा रहा है। लंबे समय से चर्चा में चल रही अटकलों पर अब मुहर लग गई है। ...

Nishant Kumar Political Debut Mar 8 New Nitish Era Begins
जदयू में वारिस की एंट्री- फोटो : social Media

Bihar Politics: बिहार की सियासत में अब एक बड़ा सियासी मोड़ आने जा रहा है। लंबे समय से चर्चा में चल रही अटकलों पर अब मुहर लग गई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार अब औपचारिक तौर पर राजनीति में एंट्री करने जा रहे हैं। 8 मार्च को वे जनता दल यूनाइटेड  की सदस्यता ग्रहण करेंगे और इसके साथ ही पार्टी की कमान संभालने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाएगी। इस फैसले की जानकारी पार्टी के सभी विधायकों और विधान पार्षदों को दे दी गई है।

बताया जा रहा है कि 6 मार्च को मुख्यमंत्री आवास पर हुई अहम बैठक में नीतीश कुमार ने खुद अपने विधायकों और एमएलसी के सामने यह इरादा जाहिर किया कि अब पार्टी की सियासत में उनके बेटे निशांत सक्रिय भूमिका निभाएंगे। राजनीतिक हलकों में इसे जदयू के “सियासी वारिस” की आधिकारिक ताजपोशी माना जा रहा है।पार्टी सूत्रों की मानें तो निशांत कुमार की एंट्री साधारण नहीं बल्कि बेहद पावरफुल तरीके से होने वाली है। चर्चा है कि नई सरकार के गठन में उन्हें डिप्टी सीएम बनाया जा सकता है। इतना ही नहीं, उन्हें गृह विभाग जैसी अहम जिम्मेदारी भी सौंपी जा सकती है। यानी उनकी सियासी लॉन्चिंग सीधे सत्ता के केंद्र से हो सकती है।

सियासी गलियारों में यह भी चर्चा है कि बीजेपी और जदयू के बीच सत्ता संतुलन को लेकर एक नई समझ बनी है। मौजूदा व्यवस्था में जहां मुख्यमंत्री का पद जदयू के पास है और बीजेपी के दो डिप्टी सीएम हैं, वहीं भविष्य में संभावित नई सरकार में बीजेपी का मुख्यमंत्री और जदयू के दो डिप्टी सीएम होने का फार्मूला तैयार किया गया है।निशांत कुमार की राजनीतिक रणनीति भी लगभग तय मानी जा रही है। अपने पिता की तरह वे भी जन संवाद और यात्रा की राजनीति को आगे बढ़ाएंगे। बताया जा रहा है कि पार्टी जॉइन करते ही वे बिहार के अलग-अलग इलाकों का दौरा करेंगे, कार्यकर्ताओं से मिलेंगे और जनता के मिजाज को समझने की कोशिश करेंगे।

इस पूरे घटनाक्रम में एक अहम पहलू यह भी है कि नीतीश कुमार भले ही सक्रिय राजनीति से थोड़ा पीछे हटने की बात कर रहे हों, लेकिन उनका प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं होगा। सूत्रों के मुताबिक वे बैकडोर से बेटे के सबसे बड़े सलाहकार और सपोर्ट सिस्टम बने रहेंगे।दरअसल जदयू के भीतर पिछले कुछ वर्षों से गुटबाजी बढ़ती जा रही थी। नीतीश कुमार के बाद पार्टी में कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं दिख रहा था। ऐसे में “सुशासन” और ब्रांड नीतीश को बचाए रखने के लिए पार्टी के भीतर भी यह राय बनने लगी कि नेतृत्व परिवार के भरोसेमंद हाथों में ही रहे।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि निशांत की एंट्री सिर्फ एक सियासी शुरुआत नहीं, बल्कि जदयू की विरासत और सत्ता संतुलन को बचाने की रणनीति भी है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि बिहार की सियासत में यह नया चेहरा किस तरह अपनी पहचान बनाता है और क्या वह अपने पिता की तरह जनता के दिलों में जगह बना पाता है।