पाली-प्राकृत भाषाओं का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बिहार के बदले ओडिशा-गुजरात में शुरू करने का विरोध, मगही कनेक्शन की बड़ी मांग

केंद्र सरकार ने असमिया, बांग्ला, मराठी, पाली और प्राकृत के अध्ययन और संरक्षण के लिए पांच सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने का फैसला लिया है। वहीं बिहार से जुड़ी भाषओं का केंद्र अन्य राज्यों में स्थापित किया जा रहा है

Pali-Prakrit Centres of Excellence
Pali-Prakrit Centres of Excellence- फोटो : news4nation

Bihar News :  पाली और प्राकृत भाषाओं के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बिहार के बजाय ओडिशा और गुजरात में स्थापित किए जाने के फैसले पर बिहार की सांस्कृतिक संस्था ‘मगही कनेक्शन’ ने आपत्ति जताई है। संस्था ने केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय से दोनों भाषाओं के अध्ययन, शोध, संरक्षण और डिजिटलीकरण के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बिहार के मगध क्षेत्र में स्थापित करने की मांग की है।


केंद्र सरकार ने हाल ही में असमिया, बांग्ला, मराठी, पाली और प्राकृत को शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिए जाने के बाद इनके अध्ययन और संरक्षण के लिए पांच सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने का फैसला लिया है। इसके तहत असमिया का केंद्र तेजपुर विश्वविद्यालय असम, बांग्ला का विश्व भारती विश्वविद्यालय पश्चिम बंगाल और मराठी का केंद्र पुणे में प्रस्तावित है। वहीं पाली के लिए ओडिशा की सेंट्रल यूनिवर्सिटी और प्राकृत के लिए गुजरात की सेंट्रल यूनिवर्सिटी को केंद्र बनाया जा रहा है।


‘मगही कनेक्शन’ का कहना है कि पाली और प्राकृत का ऐतिहासिक संबंध बिहार के मगध क्षेत्र से रहा है। संस्था के मुताबिक बौद्ध परंपरा में पाली को मागधी यानी मगध की भाषा से जोड़ा जाता है और इसका आधुनिक मगही से भी भाषाई-सांस्कृतिक संबंध माना जाता है। वहीं जैन और बौद्ध परंपराओं के कई महत्वपूर्ण धार्मिक एवं दार्शनिक ग्रंथ पाली और प्राकृत भाषाओं में उपलब्ध हैं।


संस्था ने कहा कि जिन भाषाओं की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ें मगध से जुड़ी हैं, उनके शोध एवं संरक्षण का प्रमुख केंद्र बिहार से बाहर बनाया जाना उचित नहीं है। पाली और प्राकृत के जरिए बौद्ध, जैन और प्राचीन भारतीय विचार परंपराओं को समझने में महत्वपूर्ण मदद मिलती है।


मगही कनेक्शन ने शिक्षा मंत्रालय और बिहार के मुख्यमंत्री को ईमेल के जरिए ज्ञापन भेजकर मगध में पाली और प्राकृत के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित करने की मांग की है। संस्था का कहना है कि ऐसे केंद्र से बिहार में इन भाषाओं पर उच्चस्तरीय शोध को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ प्राचीन भाषाई और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में भी मदद मिलेगी।