एक्टिंग चीफ जस्टिस सुधीर सिंह के नेतृत्व में पटना हाईकोर्ट का ऐतिहासिक रिकॉर्ड, इस मामले मेंं जुड़ा स्वर्णिम अध्याय
Patna High Court: पटना हाईकोर्ट के इतिहास में न्यायिक सुधार और त्वरित निष्पादन का एक अहम अध्याय जुड़ गया है।
Patna High Court: पटना हाईकोर्ट के इतिहास में न्यायिक सुधार और त्वरित निष्पादन का एक अहम अध्याय जुड़ गया है। लंबे समय से मुकदमों के बोझ से दबे न्यायिक गलियारों में अब मामलों के शीघ्र, पारदर्शी और व्यवस्थित निपटारे पर जोर दिया जा रहा है। इस बदलाव के केंद्र में एक्टिंग चीफ जस्टिस सुधीर सिंह का प्रशासनिक नेतृत्व बताया जा रहा है। उनके पदभार संभालने के बाद हाईकोर्ट के प्रशासनिक कामकाज और मुकदमों के निष्पादन की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए कई स्तरों पर बदलाव किए गए। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, संबंधित अवधि में मामलों के निष्पादन की दर 111.13 प्रतिशत रही। यानी अदालत में जितने नए मामले दाखिल हुए, उससे अधिक मामलों का निपटारा किया गया।
आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में कुल 15,394 मामले दाखिल हुए, जबकि हाईकोर्ट ने 17,107 मामलों का निस्तारण किया। यह आंकड़ा लंबित मुकदमों के बोझ को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।निपटाए गए मामलों में 13,350 आपराधिक मामले शामिल रहे। इनमें करीब 12 हजार जमानत याचिकाएं थीं। वहीं 3,757 सिविल मामलों का भी निपटारा किया गया, जिनमें लगभग 2,850 रिट याचिकाएं शामिल हैं।
24 घंटे में जमानत याचिका की लिस्टिंग
न्यायिक प्रक्रिया में देरी कम करने के लिए एक अहम प्रक्रियात्मक बदलाव किया गया है। यदि किसी जमानत याचिका में कोई तकनीकी त्रुटि या डिफेक्ट नहीं है, तो उसे दाखिल किए जाने के 24 घंटे के भीतर सुनवाई के लिए लिस्ट करने की व्यवस्था की गई है।इसके अलावा जमानत, अवमानना और नई रिट याचिकाओं की सुनवाई को नियमित, क्रमबद्ध और पारदर्शी बनाने पर भी जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य वकीलों और पक्षकारों को अनिश्चित प्रतीक्षा से राहत देना और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक समयबद्ध बनाना है।
हाईकोर्ट की यह नई कार्यप्रणाली न्याय में होने वाली देरी के खिलाफ एक तरह का प्रशासनिक ‘ब्रेकिंग पॉइंट’ साबित हो सकती है। खासकर जमानत याचिकाओं के त्वरित निस्तारण का सीधा असर उन पक्षकारों पर पड़ता है, जिनके लिए हर गुजरता दिन बेहद महत्वपूर्ण होता है।
111.13 प्रतिशत की निष्पादन दर और 17,107 मामलों के निस्तारण के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि मजबूत प्रशासनिक निगरानी और प्रक्रियात्मक सुधारों के जरिए लंबित मुकदमों के पहाड़ को कम किया जा सकता है। अब इस व्यवस्था की निरंतरता और इसके दीर्घकालिक प्रभाव पर न्यायिक हलकों की नजर रहेगी।