Bihar News : पटना हाईकोर्ट ने 36 साल पुराने डकैती मामले में दो आरोपियों को किया बरी, निचली अदालत की सजा किया खारिज

Bihar News : पटना हाईकोर्ट ने बांका जिले के कटोरिया थाना क्षेत्र में 36 साल पहले हुई एक डकैती के मामले में दो आरोपियों—चंद्रिका यादव और उनके पुत्र राजेंद्र यादव—को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है....पढ़िए आगे

Bihar News : पटना हाईकोर्ट ने 36 साल पुराने डकैती मामले में
आरोपी बरी - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : पटना हाईकोर्ट ने बांका जिले के कटोरिया थाना क्षेत्र में 36 साल पहले (18 जून,1990) को हुई एक डकैती के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दो आरोपियों—चंद्रिका यादव और उनके पुत्र राजेंद्र यादव—को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। जस्टिस संदीप कुमार की एकल पीठ ने निचली अदालत (फास्ट ट्रैक कोर्ट-III, बांका) द्वारा 2011 में सुनाई गई 8 साल की कठोर कारावास की सजा को रद्द कर दिया।  

यह मामला 18 जून, 1990 की रात का है। सूचक झूरी यादव (कटोरिया थाना क्षेत्र के मोथाबारी गांव निवासी) ने आरोप लगाया था कि 10 से 12 हथियारबंद डकैत उनके घर में घुस आए और बर्तन, गहने तथा नकदी लूट ली। झूरी यादव ने अपने समधी चंद्रिका यादव और दामाद राजेंद्र यादव पर बाहरी डकैतों के साथ मिलकर घटना को अंजाम देने का आरोप लगाया था।

आरोप के अनुसार, पारिवारिक विवाद और विदाई से जुड़े मनमुटाव के कारण इस वारदात को अंजाम दिया गया था। हाईकोर्ट ने कई अहम टिप्पणियां की। कोर्ट ने पाया कि घटना रात के अंधेरे में हुई थी और पहचान का एकमात्र साधन डकैतों की अपनी टॉर्च की रोशनी बताई गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि भागते और दहशत के माहौल में टॉर्च की क्षणिक रोशनी में किसी को स्पष्ट रूप से पहचानना संदिग्ध है।  

इस मामले में जांच अधिकारी की अदालत में गवाही नहीं कराई गई, जिससे बचाव पक्ष को उनके बयानों को परखने का मौका नहीं मिला और इससे आरोपियों के अधिकारों को गंभीर नुकसान पहुंचा। धारा 397 IPC के तहत सजा के लिए आरोपी द्वारा स्वयं घातक हथियार का इस्तेमाल साबित होना अनिवार्य है। कोर्ट ने पाया कि दोनों अपीलांट्स पर किसी विशेष घातक हथियार के इस्तेमाल या गंभीर चोट पहुंचाने का कोई सीधा सबूत नहीं था। घटना के समर्थन में कोई भी स्वतंत्र ग्रामीण गवाह सामने नहीं आया और न ही आरोपियों के पास से कोई लूटा हुआ सामान बरामद हुआ।  जस्टिस संदीप कुमार ने निर्णय सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा है। इसके साथ ही अदालत ने दोनों अपीलांट्स को जमानत बंधपत्र से मुक्त करने और यदि कोई जुर्माना राशि जमा की गई हो, तो उसे लौटाने का निर्देश दिया।